Friday, November 29, 2013

इन दिनों साहित्‍य में


क्षेत्र तो कोई ऐसा नहीं बचा जिसमें ध्‍यानाकर्षण हलचल नहीं हो रही है, लेकिन आजकल साहित्‍य के क्षेत्र में विचित्र घटनाएं हो रही हैं। समालोचक, कवि, साहित्‍यकार नामवर सिंह ने अभी कुछ दिन पहले एक पुस्‍तक का विमोचन किया। इस अवसर पर जिस व्‍यक्ति की पुस्‍तक का विमोचन बड़े जोर-शोर से किया गया है उसकी आपराधिक संलिप्‍तता पूर्व में चर्चा के केन्‍द्र में रह चुकी है। ऐसे में एक स्‍वाभाविक प्रश्‍न चारों ओर से, खास कर विद्वान लेखकों-साहित्‍यकारों के जगत से उभरता है कि क्‍या अब ऐसे व्‍यक्ति को साहित्‍य के मंच पर स्‍थापित किया जाएगा, जो हत्‍या के अपराध में सिद्धदोषी है।
प्रश्‍न का आशय यह नहीं है कि कोई हत्‍यारा, चोर-डकैत या गलत व्‍यक्ति समयान्‍तर में साहित्‍यकार नहीं हो सकता। प्रश्‍न के छुप हुए सन्‍दर्भों में यह बात भी हरगिज नहीं है कि इस तरह के व्‍यक्ति को कालान्‍तर में साहित्‍य के क्षेत्र में आने से रोका जाए। बल्कि प्रश्‍न के केन्‍द्र में निराशा का वह भाव है जिसमें कोई भी संवेदनशील यह महसूस करता है कि हमारे देश में आज भी कई ऐसे लेखक और साहित्‍यकार हैं, जिनके सृजन को प्रणाम करके उनका समुचित सम्‍मान किया जाना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्‍य से उनकी रचनाएं, उनका साहित्‍य पहले तो प्रकाशन के स्‍तर पर ही इतना अलोकप्रिय था कि उस तक जनसाधारण की पहुंच ही नहीं हो पायी और दूसरा उनके अग्रज साहित्‍यकारों ने उन पर अपने 'अहं' के चलते भरोसा ही नहीं किया। ऐसी स्थिति में उनका मनोबल कितने हिस्‍सों में टूटा होगा, इसकी कल्‍पना बेमानी है। अपने गहन अध्‍ययन, चिन्‍तन और उत्‍कृष्‍ट सृजन से साहित्‍य को सींचनेवाले कई श्रेष्‍ठ लेखक  हुए हैं। ऐसे साहित्‍यकारों की भी देश में कोई कमी नहीं है जिनके साहित्‍य-सृजन के मर्म को समझ कर अनेकों समाजोत्‍थान के कार्य सुनियोजित तरीके से किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसी साहित्यिक धरोहरों की अनदेखी करके धनलाभ के लिए पनपनेवाली फूहड़ लेखन-चाल में अपने को शामिल करने की जो विवशता राष्‍ट्रीय साहित्‍य अकादमियों, उनके संचालकों ने अपनाई है उसने लेखन-साहित्‍य के प्रति आम लोगों में घोर निराशा उत्‍पन्‍न कर दी है।
आज जब समाज को सही दिशा देने के लिए तमाम राजनीतिक प्रयास असफल  हो चुके हैं और यह सब राजनीतिक भ्रष्‍टाचार, विसंगतियों के परिणामस्‍वरूप हो रहा हो तो ऐसे में राजनीति से पोषित समाज में भ्रष्‍ट से श्रेष्‍ठ की नई अवधारणा पनप रही है। मतलब पहले जम कर बदमाशी, अपराध करो और जब इन सबसे मन भर जाए तो समाज-सुधार के किसी घटक के रूप में स्‍थापित हो जाओ। किसी अपराधी का लेखक-साहित्‍यकार बनना इसी स्‍थापना की एक बानगी है। इस प्रक्रिया में कथित लेखक यदि अपने को भगत सिंह, चन्‍द्रशेखर आजाद समझता है तो ये उसकी बड़ी भूल है।
     क्‍या वाकई भारतीय साहित्‍य को ऐसे पथिक की जरूरत है, जिसकी बाह्य ही नहीं आन्‍तरिक दृष्टि भी भावशून्‍य हो। साहित्‍यशाला में इस तरह के राजनीतिक प्रयोग साहित्‍य को निश्चित रूप से पंगु कर देंगे और साहित्यिक यात्रा के आरम्‍भ से लेकर जिस श्रेष्‍ठ साहित्यिक मनोरथ के पूर्ण होने की अपेक्षा देशी-विदेशी साहित्‍य-जगत ने लगा रखी थी, ऐसे में वह अपूर्ण ही रहेगा।
     ज्ञान-विज्ञान, धर्म-अध्‍यात्‍म के सम्मेलन से जिस सामाजिक संचेतना की जरूरत मनुष्‍य जाति को हमेशा से है उसमें साहित्‍य का योगदान बहुत ज्‍यादा रहा है। ऐसे में साहित्‍य के क्षेत्र का प्रतिनिधित्‍व साहित्‍य के तपस्‍वी ही करें तो बेहतर होगा।

12 comments:

  1. हमारा साहित्य इतना महान रहा है कि मुझे नहीं लगता उसके लिए किसी भी ऐसे पथिक कि जरूरत है जिसकी बाह्य ही नहीं आन्तरिक दृष्टि भी भावशून्य हो निश्चित ही साहित्यशाला में इस तरह के राजनीतिक प्रयोग साहित्‍य को निश्चित रूप से पंगु कर देंगे, कर देंगे क्या कर चुके है। लेकिन फिर भी इस विषय में ठीक ठीक कह पाना संभव नहीं लग रहा है। एक और जहां राष्‍ट्रीय साहित्‍य अकादमियों, उनके संचालकों ने यदि लेखन का बेड़ा गर्क किया है तो वहीं दूसरी और कुछ अच्छे और नए लेखकों को भी लिखने का स्थान एवं अवसर प्रदान किया है या यूं कह लो की लेखन जैसे क्षेत्र को एक नयी सोच एक नयी दिशा दी है। और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। रही बात यह‘भ्रष्‍ट से श्रेष्‍ठ’ की नई अवधारणा पनप रही है तो इसके लिए तो पाठक को स्वयं तय करना होगा कि उसे क्या चाहिए है। हाँ मगर जिस तरह हर चीज़ के कुछ फायदे और नुकसान होते हैं इस के भी है जैसे यहाँ नए लेखकों को स्थान और अवसर तो मिला लेकिन वो इस होड में यह भूल गए की एक अच्छा लेखक बनने के लिए पहले एक अच्छा पाठक होना अनिवार्य है और नतीजा यह है कि आज लेखक ही स्वयं पाठक बनकर रह गया है।
    यह सब देखते हुए तो आपके आलेख में आंत में लिखी बात ही सही लगती है। "जिसका काम उसी को साजे और करे तो ठेंगा बाजे"

    ReplyDelete
  2. सहमत हूँ. साहित्य में इस तरह का दूषण दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है. लेकिन चाहे हथकंडे जो भी अपनाये जाएँ, समय की कसौटी पर टिकता वही है जिसमे गुणवत्ता हो.

    ReplyDelete
  3. आपके पोस्ट पर बहस लम्बी हो सकती है.. बात भी आप सही कह रहे हैं, पर आज तथाकथित साहित्य के मायाजाल में पहले से डूबे दिग्गज सब कुछ सत्यानाश कर चुके हैं... आज कलम कोई भी चला सकता है..क्या फर्क पड़ता है...तय तो पाठकों को करना होगा... किताब के ग्राहक तो करोड़ों हैं, पर पाठक बेहद कम...

    ReplyDelete
  4. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  5. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  6. समाज के उत्थान में साहित्य का बहुत महत्त है... पर उस साहत्य का जो समाज को सही दिशा और सही दिशा दे.... और सही गलत का निर्णय तो पढ़क गण ही करेगें ...

    ReplyDelete
  7. उस पुस्‍तक का विमोचन' वाकई एक अजीब सी घटना ही कही जायेगी. ‘भ्रष्‍ट से श्रेष्‍ठ’ की यह नई अवधारणा साहित्य का उपहास लगता है.

    ReplyDelete
  8. नेतृत्व के अभाव में समाज ही सामूहिक नेतृत्व का भार साध लेता है।

    ReplyDelete
  9. साहित्य में भी अब यही होनाहै क्या कि जिसकी लाठी उसका गुणगान....बढ़िया है..

    ReplyDelete
  10. साहित्‍य के क्षेत्र का प्रतिनिधित्‍व साहित्‍य के तपस्‍वी ही करें तो बेहतर होगा।
    ....एक सही सोच..लेकिन आज किसी भी क्षेत्र में घुसपैठ का रिवाज़ बढ़ता जा रहा है...

    ReplyDelete
  11. राजनीती से पोषित समाज है या समाज से पोषित राजनीति ये विचारणीय है। वस्तुतः ये मानदंड एक दिन में तो स्थापित नहीं हो सकते क्रमिक विषंगतिओं का तात्कालिक उपदान है साथ-ही-साथ भविष्य कि चेतावनी ......

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards