Sunday, November 24, 2013

सुस्‍त मौसम में बदलाव की आन्‍धी

जकल का समय बड़ी सुस्‍ती से कट रहा है। आधी रात के बाद जहां बैठा हूँ वहां से धुंधला चांद दिख रहा है। पूर्व दिशा में संतरी रंग का बुझा-बुझा चन्‍द्रमा अपने साथ एकमात्र टिमटिमाते तारे को लेकर खुश है। अपने प्रशंसकों के लिए इस वक्‍त जैसे वह अपनी असली चमक खो चुका है। तभी तो उसके साथ इस गुलाबी ठंड में केवल एक ही तारा मौजूद है। मैंने भी उसकी तरफ एक नजर देखा और दरवाजे, खिड़कियों के परदे गिरा कर बैठ गया। कहीं दूर किसी के विवाह समारोह में बज रहे गानों की धीमी आवाज सुनाई दे रही है। ज्‍यादातर लोग गुलाबी ठंड में अपने बिस्‍तरों पर सिमट चुके हैं। मैं भी घर, बिस्‍तर और अन्‍त में अपने अन्‍दर तक सिमट गया हूँ। कुछ ऐसा नहीं सोच पा रहा हूँ, जिससे आत्‍ममुक्‍तता का अनुभव हो। बस अपनी स्‍मृतियों को पलटने पर लगा हुआ हूँ। इनमें से क्‍या-क्‍या निकल रहा है और क्‍या-क्‍या भूला-बीता हो रहा है, इसकी भरमार है।
सन्‍तरी रंग का अर्द्धचन्‍द्र
संसार में, भारत में आज से लेकर पिछले कुछ दिनों तक जो कुछ घटित हुआ उसकी स्‍मृतियां मेरे दिमाग से हटने लगी हैं। कल नहाने की शुरुआत करते ही कुछ प्रभावशाली विचार स्‍मृति में आए थे, लेकिन स्‍नानघर से बाहर आते-आते और सम्‍पूर्ण दिनचर्या से निपटते-निपटते तक प्रभावशाली विचार विस्‍मृत हो गए। आधे घंटे तक यूं ही बिना कुछ सोचे बैठा रहा। जब ये अहसास हुआ कि नहीं ऐसे कैसे मूढ़ मस्तिष्‍क के साथ समय गुजार रहा हूं तो तुरन्‍त विचारमग्‍न हो गया, पर ये भी लगा कि विचार करुं तो किस विषय पर! आज सब कुछ, सभी विषय आपस में इतने गड्डमड्ड हो चुके हैं कि उनमें से एक को छांट कर उस पर बात करने के सच्‍चे आधार ढूंढने बैठो तो असफलता ही हाथ लगती है।
जीवन सम्‍बन्‍धी विषयों के आपस में गड्डमड्ड होने का मतलब बहुत गहरा, गोपनीय है। देशी-विदेशी शासन के गठजोड़ से समाज का जो नया रूप तैयार हो रहा है उसे कोई भी सच्‍चा गृहस्‍थ, संत या आम व्‍यक्ति मन से स्‍वीकार करने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। बेशक समाज का यह नया रूप आम जीवन के व्‍यवहार में मौजूद है या कह सकते हैं कि इसे जबरन आम जीवन पर थोपा गया है, लेकिन अन्‍दर-ही-अन्‍दर आम जीवन की आत्‍मा इस नए रूप से बचने के लिए छटपटा रही है। जनसाधारण के जीवन की रचनात्‍मकता, स्‍वाभाविकता बाहर आने के लिए कुलबुला रही है। जब किसी स्‍थूल या निर्जीव वस्‍तु को भी प्रकृति के विरुद्ध बांध कर नहीं रखा जा सकता तो मनुष्‍य तो भावनाओं का ज्‍वालामुखी है। आखिर उसे कब तक उस राह पर चलने को विवश किया जा सकता है, जिसकी मंजिल का पता ही नहीं। झूठ, फरेब और धोखे से जनमानस को कुछ समय तक बहकाया जा सकता है और अब यह कुछ-समय की अवधि खत्‍म हो गई है। इसलिए भारतीय जनमानस के अन्‍दर भभकते बदलाव के ज्‍वालामुखी से देश-दुनिया के शासक बुरी तरह डरे हुए हैं।    
इन लोगों को इस बार ज्‍यादा डर इसलिए लग रहा है क्‍योंकि बदलाव की आंधी दुनिया को सभ्‍यता सिखानेवाले भारत में बह रही है। अगर भारत में बह रही यह आंधी पुराने राजनैतिक, शासकीय कचड़े को बहा ले जाती है तो निश्चित ही एक नए समाज का सूत्रपात होगा। संसार के शासकों की कुटिलता को हमेशा से  छुपा कर रखनेवाले और अपने को छदम विद्वता के वेश में प्रस्‍तुत करनेवालों के लिए ये बड़े संकट की घड़ी है। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा कि वे करें तो क्‍या करें। जिनके बूते उनकी पत्रकारिता (मैं इसे पत्रफाड़िता कहूंगा) चल रही है वे तो अब किनारे बैठने वाले हैं और जिनके विरुद्ध इन्‍होंने झूठी बातों, वक्‍तव्‍यों, वाद-विवाद को हवा देने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी वे सिंहासन पर बैठने वाले हैं। इन्‍हें यह अहसास भी है कि आगामी शासक इनकी धूर्तता को पहचानता है। वह इन्‍हें किसी भी कीमत पर अपने साथ नहीं जोड़ेगा। अब तो लोगों ने भी इन पर भरोसा करना छोड़ दिया है। तब इनके पास अपने छदम रूप के साथ आत्‍महत्‍या करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। इसलिए ये बदलाव की आंधी को रोकने के लिए कुण्ठित शासक के हर आदेश का पालन कर रहे हैं, ताकि इनको पालनेवाला यह तंत्र सुरक्षित रह सके।

18 comments:

  1. झूठ, फरेब और धोखे से जनमानस को कुछ समय तक बहकाया जा सकता है और अब यह कुछ-समय की अवधि खत्‍म हो गई है। इसलिए भारतीय जनमानस के अन्‍दर भभकते बदलाव के ज्‍वालामुखी से देश-दुनिया के शासक बुरी तरह डरे हुए हैं।

    आपकी सद्य टिप्पणियाँ ही हमारे लिखे की आंच हैं। बहत खूब दोस्त परिवेश प्रधान आपका लेखन सर चढ़के बोलता है।

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  2. आह!!! कितना मोहक चित्रण किया है आपने गुलाबी ठंड में नरिंगी चाँद और एक तारा...सच कहूँ तो यह पढ़कर लगा आगे भी यह पोस्ट प्रकृति की ऐसी ही सुंदरता पर कायम रहती कितना अच्छा होता नहीं ? खैर जैसा कि आपने कहा इन लोगों को इस बार ज्‍यादा डर इसलिए लग रहा है क्‍योंकि बदलाव की आंधी दुनिया को सभ्‍यता सिखाने वाले भारत में बह रही है। बस यह आँधी यूं ही बहनी चाहिए। ताकि सारा राजनीतिक कचरा साफ हो जाये और एक बार फिर वही पुराने भारता का निर्माण हो सके। जिसके गुणो से जलने के कारण इन गोरों से उसे बर्बाद क्र दिया था।

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  3. बहत खूब विकेश जी, सुन्दर आलेख के लिए आपको धन्यवाद।

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  4. निश्चय ही बदलाव देश के लिए काफी अच्छा है. लोगों के पास अब सूचनाएं त्वरित गति से पहुँच कर हमें बचने का मौका दे रही है. जरूरत है हम इसे अपनी ईमानदारी से आगे ले जाएँ.

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  5. इन लोगों को इस बार ज्‍यादा डर इसलिए लग रहा है क्‍योंकि बदलाव की आंधी दुनिया को सभ्‍यता सिखानेवाले भारत में बह रही है। अगर भारत में बह रही यह आंधी पुराने राजनैतिक, शासकीय कचड़े को बहा ले जाती है तो निश्चित ही एक नए समाज का सूत्रपात होगा। संसार के शासकों की कुटिलता को हमेशा से छुपा कर रखनेवाले और अपने को छदम विद्वता के वेश में प्रस्‍तुत करनेवालों के लिए ये बड़े संकट की घड़ी है। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा कि वे करें तो क्‍या करें। जिनके बूते उनकी पत्रकारिता (मैं इसे पत्रफाड़िता कहूंगा) चल रही है वे तो अब किनारे बैठने वाले हैं और जिनके विरुद्ध इन्‍होंने झूठी बातों, वक्‍तव्‍यों, वाद-विवाद को हवा देने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी वे सिंहासन पर बैठने वाले हैं। इन्‍हें यह अहसास भी है कि आगामी शासक इनकी धूर्तता को पहचानता है। वह इन्‍हें किसी भी कीमत पर अपने साथ नहीं जोड़ेगा। अब तो लोगों ने भी इन पर भरोसा करना छोड़ दिया है। तब इनके पास अपने छदम रूप के साथ आत्‍महत्‍या करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। इसलिए ये बदलाव की आंधी को रोकने के लिए कुण्ठित शासन के हर आदेश का पालन कर रहे हैं, ताकि इनको पालनेवाला यह तंत्र सुरक्षित रह सके।

    बेशक इस बदलाव की आंधी का वाहन इन दिनों वाही चाय वाला छोटू है। जिसने अपने अनथक उद्यम से थाली बैंगनों को उनकी औकात बताई है ,समझाया है राजनीति में भी होम वर्क होता है महनत होती है। कुनबे का लेवल भी बुद्धि मंदों के काम नहीं आता है उसके लिए भी एक इंदिरा -नेहरू गांधी चाहिए। एपॉइंटिड प्रधान मंत्री ने आज देश को कहाँ पहुंचा दिया है। रूपये की साख उनकी तरह ही डूब गई है। उठना चाहता है उठ नहीं पाता। विकेश वडोला का लेखन परिवेश और दर्शन दोनों लिए रहता है।

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  6. रुचिकर प्रस्तुति-
    आभार भाई जी-

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  7. सुस्ती सिरहाने खड़ी, रही सिहरती देह ।
    चलो चले उस की तरफ, जिससे जिसको स्नेह ।

    जिससे जिसको नेह, उन्हें काया परकाया ।
    लूट कोयला कोय, कोय सी डी बनवाया ।

    है चुनाव की बेर, देख रविकर यह कुश्ती ।
    उठापटक अंदाज, भगाए रविकर सुस्ती ॥

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  8. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  9. बदलाव की जो आँधी चली है उसे कोई नहीं रोक सकता है..... आखिर कब तक जनमानस को झूठ फरेब अँधा कानून से डरते रहेंगे... बदलाव तो आना ही है जो दिख रहा है .....

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  10. बदलाव की जो आँधी चली है उसे कोई नहीं रोक सकता है..... आखिर कब तक जनमानस को झूठ फरेब अँधा कानून से डरते रहेंगे... बदलाव तो आना ही है जो दिख रहा है .....

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  11. गुलाबी ठण्ड और आत्‍ममुक्‍तता का अनुभव ..स्मृतियाँ ...विचारों की बढ़त के लिए एक लेखक को और क्या चाहिये?
    जिस बदलाव की आंधी बह रही है वह बदलाव आना आवश्यक है.

    अपने हथकण्डे असफल होते देख कर वर्तमान शासन खिसिया ज़रूर गया है!देखें, आगे क्या होता है!

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  12. chaand santari rang ka bhi ho sakta hai ye aaj pata chala (shukar hai ki pata toh chalaa varna bepata rah jaate :P ) badlaav toh maanav ki pragati ka ek hissa hai dheeme ya turant aayega zarur

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  13. सशक्त भावाभिव्यक्ति। बेहतरीन रचना। आपकी प्रागुक्ति खरी सिद्ध होगी महज़ भविष्य कथन नहीं है यह।

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  14. कौन रोक सकता है यह आंधी को आएगी तो जरुर
    प्रकृति को समेटकर जो नये बिम्ब गढ़े हैं आपकी सृजनात्मकता को दर्शाते हैं
    प्रभावशाली और रोचक आलेख
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

    आग्रह है--
    आशाओं की डिभरी ----------

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  15. प्राकृतिक सुंदरता में भी गहरे बदलाव की बयार का चित्रण ... शब्दों की कलाकारी और भावों का तूफ़ान है ये पोस्ट ...

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  16. परिवर्तन ही तो सत्य है...बदलाव की आंधी में बहुत कुछ होना बाकी है... हम भी प्रतीक्षा कर रहे हैं...बढ़िया पोस्ट..

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  17. परिवर्तन शाश्वत है, उसकी गति भी परिवर्तनशील है।

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