Saturday, October 19, 2013

शरद पूर्णिमा के चांद का साथ


ल रात छत पर साक्षात स्‍वर्ग में होने का अनुभव हुआ। शरद पूर्णिमा का चांद बीच आसमान में चमक रहा था। धार्मिक अनुष्‍ठान कर भगवान और स्‍वर्ग तक पहुंच मोक्ष की इच्‍छा रखनेवाले अधिकांश लोग शरद पूर्णिमा के साक्षात स्‍वर्ग से अनभिज्ञ घरों में सो रहे थे। आसमान की डगर पर घड़घड़ाते लाल प्रकाश को जलाते-बुझाते इंदिरा गांधी हवाई अड्डा दिल्‍ली की ओर बढ़ते हवाई जहाज ने थोड़ी देर तक चंदा से मेरा ध्‍यान हटाया। कल्‍पना करने लगा कि हवाई जहाज में बैठे यात्रियों को पूर्णिमा का यह चांद कैसे लग रहा होगा! जहाज की खिड़की से अगर कोई यात्री इसे देखता होगा तो उसे चांद और अपना अस्तित्‍व एकसमान यानि कि आसमानी लगता होगा! हवाई जहाज कुछ ही देर में आंखों से ओझल हो गया।
फिर सोचने लगा कि चांद पर जाने के इच्‍छुक वैज्ञानिकों ने क्‍या कभी उसे उसी उन्‍मुक्‍तता से देखा होगा जैसे कि गांव घरों में लोग देखा करते थे? क्‍या कभी उन्‍होंने चांद को उस रुप में प्रस्‍तुत करने का कोई प्रमाण दिया, जिस रुप में वह धरती से नजर आता है। क्‍या उन्‍होंने ऐसा कोई नजारा दिखाया, जिसमें धरती से जैसे चांद दिखता है वैसे ही चांद से धरती भी किसी चमकते या अन्‍य आकर्षक प्रारुप में दिखे? क्‍या इस बात पर भरोसा किया जा सकता है कि मानव सभी प्रकृति रहस्‍यों को खोल के रख देगा और ब्रह्माण्‍ड के अस्तित्‍व से सम्‍बन्धित सभी प्रश्‍नों के उत्‍तर दे देगा? क्‍या प्रकृति अर्थात आकाश, चांद-तारों, सूर्य, पृथ्‍वी को वैसे ही नहीं रहने दिया जाना चाहिए, जिस रुप में वे मुझ जैसे एक साधारण प्राणी को नजर आते हैं? वैज्ञानिक दुष्‍प्रभावों से पीड़ित प्रकृति की कराह हमें क्‍यों नहीं सुनाई देती? आज देश-दुनिया में भूकम्‍प, समुद्री तूफान, जल चक्रवात आंधी, बादल फटने, अतिवृष्टि की घटनाएं बहुत ज्‍यादा बढ़ गई हैं। क्‍या इसे हमें विज्ञान प्रयोगों के कारण दर्द से बिलबिलाती प्रकृति का चि‍ड़चिड़ापन नहीं समझना चाहिए? क्‍या प्रकृति से हमारी अनावश्‍यक छेड़छाड़ तब तक नहीं रुकेगी जब तक इसके प्रतिकार से समस्‍त मानवजाति समूल नष्‍ट नहीं हो जाती? आज शहरी लोगों का इन प्रकृति विशेषताओं पर कभी ध्‍यान नहीं जाता। उन्‍हें चांद-सूरज से कोई सरोकार नहीं है। सूर्य-चन्‍द्रमा कब निकलते हैं कब डूब जाते हैं, उन्‍हें इसकी कोई लगन नहीं है।
यह सब सोचते-सोचते कितना समय गुजर गया पता ही नहीं चला। अब तक चांद का शीत प्रभाव भी फैल चुका था। हवा की शीतल, शान्‍त बयार में शरीर जैसे तितली बन कर उड़ने को तैयार था। मैं जैसे शरद पूर्णिमा के अनुभवी ताप में पिघल कर हवा में मिल गया। विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि इस रात्रि से पहले मेरा कोई जीवन था और इसके बाद भी मेरी कोई जिन्‍दगी होगी। शरद पूर्णिमा की इस रात और इसके चन्‍द्रमा को छोड़ कर जाने के लिए मन ने केवल एक बार सोचा और इनके साथ रहने के लिए आत्‍मा ने हजारों संकल्‍प कर लिए। लेकिन कम्‍बख्‍त आदमी के पास एक व्‍यावहारिक दिमाग भी तो होता है, जो उसे हर बार वास्‍तविकता के साथ समझौता करने को राजी कर देता है। मेरे साथ भी यही हुआ। एक नए हलके शरीर और पूरी तरह से बदले हुए मन के साथ मैं कमरे में आया। तीन चार घंटे घूमते-घूमते टहलते हुए चांद रात का साथ निभाया था इसलिए नींद में समानेवाली थकावट होनी स्‍वाभाविक थी। बिस्‍तर पर पसरा ही था। सोच रहा था कि छत के ऊपर आसमान और इसमें चांद चमक रहा है और अभी-अभी मैं इससे प्रभावित होकर नीचे आया हूँ। मन में हूक सी उठ रही थी कि नहीं ऊपर छत पर ही चल। दोबारा उठता, ऊपर छत पर जाता और शरद पूर्णिमा का गोल चांद देखता इससे पहले ही आंखें लग गईं। सुबह की कुनकुनी ठंड से नींद खुली तो मैंने खुद को सुखद भ्रम से जकड़ा पाया।
     
अच्‍छा लगता जब
शरद पूर्णिमा का चन्‍द्र चमकता
मखमली हवा धीमे से सरकती
पेड़-पत्तियां धीमे-धीमे हिलतीं
प्राणियों का अभिवादन करतीं
 आकाश में चमकते सुन्‍दर
चन्‍द्रमा के अन्‍दर झांक कर
 इसके दाग धब्‍बों पर अटकता
 वे भी आश्‍चर्य ही उत्‍पन्‍न करते
सद्भावनाएं बढ़ाते संवेदनाएं उपजाते
 रात छत पर टहलते हुए बीती
प्रकृति प्रेम में और कुछ न सूझी
 अमृत छिड़कती हवा अहा कितनी मधुर
आकाश जाने की ज्‍यों कोई फूलोंवाली डगर
सुगंधा संगीता संवेदना संजीविता का तरल भाव
अपने में खींचता अच्‍छाइयों का सामू‍हिक बहाव
वैर द्वेष ईर्ष्‍या जलन कुढ़न घुटन सब पर दूधवर्षा
 अन्‍दर-बाहर सब कुछ धुला उजला श्‍वेत सहर्षा
हृदय तोड़ा दिव्‍य रात्रि को दी विदाई
 कक्ष में कैद मैं मन पर शरद पूर्णिमा छाई  
शुक्रवार १८ अक्‍टूबर को शरद पूर्णिमा के उपलक्ष में।

18 comments:

  1. pakarti me kho jane vala saravg men hi phunch jata hai

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  2. हृदय तोड़ा दिव्‍य रात्रि को दी विदाई
    कक्ष में कैद मैं मन पर शरद पूर्णिमा छाई
    वर्तमान हालात में मनाई जाने वाली शरद पूर्णिमा का एकदम सटीक नक्शा खींचा है आपने..। देखा जाए तो अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है हम अभी यदि सामूहिक रूप से प्रयास करें तो बचा सकते हैं अपनी इस अनमोल धरोहर "प्रकृति" को मगर समय के आभाव और विज्ञान की प्रगति ने जैसे सब को मूक बधिर सा बना दिया है।

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  3. मन को छूती रचना |बढ़िया शब्द चयन और बिम्ब |
    आशा

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  4. पूर्ण चन्द्र सा खिलता आलोड़ित होता मन। सुन्दर बिम्ब और भाव पिरोये हैं रचना में। कौतुक से प्रश्नों को निहारा भी है।

    हाँ राकेश शर्मा ने कहा था चाँद से पृथ्वी वैसे ही दिखती है जिसे पृथ्वी से चाँद।

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  5. बहुत सुन्दर पोस्ट. बहुत अच्छा लगा शरतकालीन चाँद के बारे में पढ़कर. यहाँ तो रात है अभी.. तो मैंने भी उत्सुक होकर चाँद को झाँक लिया. आभा वैसी ही है जैसा आपने लिखा है लेकिन बाहर ठंड है इसीलिए ज्यादा देर निहार नहीं सकता.

    सच लिखा है .. कहाँ समय रह गया है प्रकृति को देखने के लिये, उसके बारे में सोचने के लिए...इस तरह का आनंद उठाने के लिए.

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  6. बहुत सुन्दर पोस्ट विकेश जी आभार।

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  7. हृदय तोड़ा दिव्‍य रात्रि को दी विदाई
    कक्ष में कैद मैं मन पर शरद पूर्णिमा छाई ..

    शरद का चाँद ... वो भी अपने पूर्ण रूप में ... वैज्ञानिक बातें कहां आती हैं भावनाओं ओर संवेदनाओं के बीच में ... इन्सान चाहे चाँद पे हो आए ... आस्था के पार नहीं जा सकता ...

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  8. एक अन्य लोक में ले जाती बहुत मनभावन प्रस्तुति...

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  9. शरद का चाँद छत पर प्रेमिका रूपी
    आसमान का चाँद शीतल उजला जीवन की तरह

    वाह बहुत सुंदर आलेख,साथ में रचना बहुत सुंदर ------
    गजब

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  10. बहुत सुन्दर, सजीव झांकी प्रस्तुत करता आलेख और भावप्रवण कविता।

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  11. और उस सलोने चाँद से की गयी आपकी गुप-चुप बातें.. वाह ! ..हमें तो वो बातें भी सुनाई दे गयी जिसे आपने हमसे नहीं कहा है ..

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  12. शरद पूर्णिमा के चाँद की शीतलता को महसूस करना ही अपने आप में एक सुखद अनुभव होता है.
    और फिर व्यवाहरिकता के धरातल पर उतर कर आना ही पड़ता है.
    वहां गुलाबी सर्दी शुरू हो गयी होगी ,यहाँ तो अब भी ए सी चल रहे हैं.

    अच्छी पोस्ट.

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  13. कहते हैं, शरद पूर्णिमा का चाँद अमृत बरसाता है।

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  14. बहुत सुंदर भाव.... और शरदपूर्णिमा पर..... प्रभावशाली आलेख और अभिव्यक्ति.... !!

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  15. वाह ...कितना सुंदर और दिलचस्प चित्रण ...

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  16. मैं भी जाग रहा था आधी रात के उस चाँद के साथ
    वाकई स्वर्ग सी अनुभूति देता दृश्य, बड़ा ही मनोरम

    उसी दिन कोजगरी पूर्णिमा मनायी जाती है
    कविताबेहद सुन्दर !
    साभार !

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  17. रात में छत पर बिछौने ड़ाल लेटे ...आसमान के हरेक तारे से बतियाते ..चाँद की धरती पर उतरने से ज़रा पहले नींद के आगोश में समाते बचपन की यादों को छेड़ दिया इस पोस्ट ने ......शरद-पूर्णिमा की रात हांडी में धरी गयी खीर ...उफ्फ ...क्या दिन थे वो भी . क्या हम उनका कोई विकल्प हो सकता है कभी !!

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