महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, October 12, 2013

सपने में और इसके बाद


…….नींद से चौंक कर उठना पड़ा। देखा तो बिस्‍तर के किनारे पर मित्र दम्‍पत्ति अपनी साढ़े पांच और एक साल की बेटियों के साथ बैठे हुए हैं। ये पूछने के बजाय कि इतनी रात को आप लोग यहां क्‍या कर रहे हैं मैं उनकी ऐसी सहज उपस्थिति से नई खुशी का अहसास करता रहा। पत्‍नी ने मेरी सहजता पर मुंह बनाया और इशारों ही इशारों में बताया कि अब इनके सोने का भी बन्‍दोबस्‍त करो। बिटिया सो रही थी। उसी के बगल में दम्‍पत्ति की बेटियों को लिटा दिया गया। अपने कारण हमारे लिए तकलीफ बनने का अहसास दम्‍पत्ति को भी था। इसलिए उन्‍होंने बताना शुरु किया कि वे क्‍यों अचानक इतनी रात गए हमारे घर आ धमके हैं। रवि भाई साहब ने बताया कि दूसरे तल के घर में किसी की मौत हो गई है। प्रथम तल के हमारे घर के सामने लगे जीने से होकर ही लोग ऊपर जा रहे हैं, वहां से आ रहे हैं। हमें ऐसे माहौल में अपनी एक साल की बेटी की चिंता हुई और हमने फैसला किया कि हमें अपने घर पर ताला लगा कर आपके घर में आ जाना चाहिए। इस चिंता में मैं ये भी नहीं सोच पाया कि आपके दो कमरों के किराए के घर पर इतने लोग कैसे सो पाएंगे। उनकी बात सुन कर मैंने जल्‍दी में कोई दिलासा देना उचित नहीं समझा। मेरे दिमाग में इतना ही आया कि सबसे पहले पति-पत्‍नी को बच्‍चों सहित सुला दूं। बाकी बातें सुबह कर लेंगे। भाई साहब ने मेरी और अपनी पत्‍नी की तरफ देखा, सोते हुए तीनों बच्‍चों को सहलाते हुए कहा कि इन लोगों को सोने देते हैं और हम दूसरे कमरे में बैठते हैं। पलक झपकते ही मैं किसी दूसरे घर में प्रकट हो जाता हूँ। मुझे बताया जाता है कि कुछ दिन पहले इस घर की मा‍लकिन चल बसी हैं। जहां मैं खड़ा होता हूँ फर्श के उस हिस्‍से की ओर उंगली करके कोई बताता है कि मृत मालकिन को यहीं पर लिटाया गया था। अचानक मैं पूरे कमरे में दृष्टि घुमाता हूँ। कमरा क्‍या था ये तो चार बाई छह की कोई ऐसी जगह लगती थी जहां एक पल भी और ठहरने से मैं भी वहीं लेटा हुआ मिलता जहां मृत होकर मालकिन लेटी हुई थी…….
घटाटोप बादलों के कारण अन्‍धेरे में तब्‍दील धरती
दो ऐसे अटपटे सपने देखकर नींद इस कदर खुल गई कि आलस्‍य में बिस्‍तर पर पड़े रहने का बिलकुल मन नहीं हुआ। बाहर पौ फट चुकी है। उजाला धरती पर सब जगह फैल गया। साढ़े पांच बजे हैं। आसमान जैसे बरसने को तैयार। 10 अक्‍टूबर 2013 का ये दिन। हवा बिलकुल नहीं है। इस माह में भी तेज गति से पंखा चल रहा है। गर्मी है। मुंह धोकर बाहर पार्क में टहलने आ गया हूँ। गली से गुजरते हुए सुबह सवेरे जो भी नजर आया वो बारिश आने से पहले घटाटोप बादलों के कारण अन्‍धेरे में तब्‍दील धरती पर बहुत असहाय
बारिश के तूफान के आगे असहाय मनुष्‍य
लगता था। मनुष्‍य जीवन की सच्‍चाई जैसे इस वक्‍त भ्रमपाश में बंध गई थी।
पार्क के दो चक्‍कर लगाता हूँ लेकिन प्राकृतिक कुरुपता ने ज्‍यादा देर पार्क में रहने न दिया। टहलते-टहलते बल्‍लभ डोभाल जी के घर पहुंचा। वे घर के बाहर कुर्सी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे हैं। वहीं उनके पास बैठ जाता हूँ। बातें होने लगी हैं। थोड़ी देर हुई बैठे हुए कि बारिश की मोटी-मोटी बूंदें बरसने लगती हैं। कुर्सियां अन्‍दर ले आता हूँ। वे दरवाजा खुला छोड़ देते हैं। बाहर बारिश की मोटी जलधारें। अन्‍दर चाय की चुस्कियों के साथ बातों, किस्‍सों, विमर्श, संस्‍मरण सुनने-सुनाने का एक बेहतरीन समय गुजरता है। लगभग दो घण्‍टे जम कर बरसने के बाद पानी सड़कों पर लबालब भर गया है। पानी के बुलबुलों पर दृष्टि टिकाए हुए डोभाल जी के किस्‍से-कहानियां सुन रहा हूँ। रात जो बेतुके सपने आए उनसे नींद बुरी तरह प्रभावित हुई। इसलिए बीच-बीच में आंखें अनिद्रा के बोझ से बन्‍द हो जाती हैं। लेकिन कान तन्‍मयता से चौरासी वर्ष के अनुभव को सुन रहे हैं। इस दौरान डोभाल जी ने चाय पिलाई और हलवा बनाकर खिलाया। मुझे बड़ी शर्म आ रही थी कि डोभाल जी बुजुर्ग हैं और वे चाय और हलवा बना रहे हैं। मैंने उन्‍हें मना किया कि रहने दीजिए लेकिन वे नहीं माने। खैर हलवा खाकर अच्‍छा लगा। बारिश बन्‍द होने के बाद अपने घर की तरफ चल दिया।

11 comments:

  1. sansmaran me pristithi ko aapne bebaki se varnan kiya hai, haalat par achchha sansmaran hai

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  2. इस संस्मरण या आलेख के तहत आपने क्या कहने कि कोशिश कि इस बार मैं समझ नहीं पायी...:)

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  3. एक विश्व है, सब लोगों को कुछ वर्षों के लिये किराये पर ही मिला है। जी लें जीभर।

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  4. डरावने सपनो का संसार भी अजब ही है. कहाँ से कब कैसे, कहानियाँ आ जाती हैं मन में, किरदार जाते हैं और नींद गायब कर चले जाते हैं.

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  5. डरावने सपनो का संसार भी अजब ही है, कहाँ से कब कैसे, कहानियाँ आ जाती हैं मन में।यह सपनों का संसार भी अजीब है विकेश जी।

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  6. सपनों का भी अपना एक संसार होता है, जो भटकता घूमता रहता है
    वह कब कहाँ कैसे किस की नींद में आ जाये कोई नहीं जानता

    आपने सपने को रोचकता दी है----
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

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  7. स्वप्न संकेत गूढ़ होकर भी सत्य के बेहद करीब होता है और जागृति तो खुली आँखों में ही स्वप्न-जगत का निर्माण करता रहता है और हमें भान भी नहीं रहता है...

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  8. कई बार सपने गहरा प्रभाव छोड़ते हैं मन मष्तिष्क पे ... पूरा माहोल भारीपन लिए हो जाता है ... ऐसे में प्राकृति भी साथ नहीं देती कई बार ... पर बारिश में चाय ओर हलवा जरूर माहोल को बदल देता है ...

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  9. कभी -कभी सपने इतने सच लगने लगते हैं कि आँख खुलने पर भी यकीन नहीं होता कि यह सपना ही था !
    बारिश....८४ साल के अनुभव संस्मरण ....चाय ..हलवा और वह भी एक बुजुर्ग के हाथों का बना ..यह भी सौभाग्य है .

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  10. जाने कौन से विचार यूँ सपनों में दस्तक देते हैं ...कभी कभी सच में डरा जाते हैं

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  11. aapka memoire likhne ka tareeka achha hai .. saral aur sahaj bhasha.

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