महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Monday, October 28, 2013

हिन्‍दुस्‍तान में हिन्‍दू होने की सजा

चपन में पता नहीं था कि बड़े होने पर जिन्‍दगी को कई तरह से जीना पड़ेगा। छुटपन में छोटी-छोटी चीजों को पाकर खुश होने के अनुभव आज कितने मूल्‍यवान लगते हैं। बच्‍चों के जीवन में धर्म, जाति, वर्ग, समाज, देश, विदेश के विभेद नहीं होते। जब तक उनको बताया न जाए या परिवेश को देखते-देखते वे सीख न जाएं उन्‍हें पता ही नहीं होता कि परिवार, समाज, देश, विदेश के नाम पर मानव-जीवन का प्रत्‍यक्ष बंटवारा कितने ही आन्‍तरिक बंटवारों से भी जूझ रहा होता है। उन्‍हें अपने माता-पिता के साथ-साथ अन्‍य रिश्‍तेदारों के मतभेदों, ईर्ष्‍याओं का कोई भान नहीं होता। वे अपनी चंचल, मनसुख और बालसुलभ जिन्‍दगी में जिस-जिस को देखते हैं, जिसे भी मिलते हैं सबको एक कुटुम्‍ब समझते हैं। जहां भी जाते हैं उसे अपना घर समझते हैं। लेकिन धीरे-धीरे जहरीले समाज के कीटाणु बच्‍चों को पथभ्रष्‍ट करने लगते हैं। इसकी शुरुआत अमूमन घर से ही होती है।
      बचपन की बातें इसलिए कीं क्‍योंकि बड़ों का व्‍यक्तित्‍व बचपन की नींव पर ही तैयार होता है। आज इस देश में मुझे भी अपनी उपस्थिति बड़ी विचित्र लगने लगी है। हिन्‍दू होकर भी विश्‍वास नहीं होता कि मैं हिन्‍दू हूँ। साम्‍प्रदायिकता, कम्‍युनिस्‍ट, समाजवाद, कांग्रेसवाद, मिशनरीवाद और न जाने कितने ही दिशावादों से घिरे विश्‍व और इसके अन्‍दर भारत देश में अपना अस्तित्‍व बड़ा ही मिश्रित, कुण्ठित सा लगता है। बचपन से लेकर आज तक मेरे जैसों के राष्‍ट्रीय पथप्रदर्शक इतना भी तय नहीं कर पाए हैं कि उन्‍हें देश में सतत शान्ति चाहिए या शान्ति भंग करने की कवायद में जुटे मतांतरों का प्रसार करनेवाले राजनीतिक दल, संगठन चाहिए। इस सन्‍दर्भ में जो सबसे पहली बात आती है वो है देश के दो प्रमुख राष्‍ट्रीय राजनीतिक दलों का देशव्‍यापी समस्‍याओं को लेकर परस्‍पर आरोप-प्रत्‍यारोप। यहां किसी एक दल विशेष का पक्ष लिए बिना ये बात तो कही ही जा सकती है कि एक दल ने स्‍वतन्‍त्र भारत के समय से लेकर सन २००३ तक और एक दल ने छोटे-मोटे राष्‍ट्रीय क्षेत्रीय दलों के भरोसे राजग (राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्‍व में) बन कर केवल पांच वर्ष तक देश पर शासन किया। तब राष्‍ट्रीय उन्‍नति और अवनति के लिए इन दो दलों के बीच में तुलना करना अनुचित है। बाद में अवतरित होनेवाले दल यानि कि भाजपा को भी आनेवाले पैंसठ साल तक राष्‍ट्रीय व्‍यवस्‍था संभालने दें। तब कांग्रेस और भाजपा के कार्यों की तुलना की जानी चाहिए। दशकों से जिस राजनैतिक नेतृत्‍व में चारों ओर गन्‍दगी ही फैली, नए नेतृत्‍व को पहले तो ऐसी गंदगी को ही साफ करने के लिए कई दशक चाहिए। नए नेतृत्‍व के विकास और पुराने नेतृत्‍व के साथ उसकी तुलना की बातें तो बाद की हैं। 
      आज दुख इस बात का है कि हिन्‍दू होकर हिन्‍दू अवधारणा को संशकित नजर से देखता बुदि्धजीवी वर्ग अगर साम्‍प्रदायिकता के लिए किसी को दोषी ठहराता है तो वो है भाजपा, संघ और हर वह हिन्‍दू संगठन जो हिन्‍दुस्‍तान में रह कर मूल्‍यों की बात कर रहा है। कांग्रेसवाद में दशकों से देश में जिस अपसंस्‍कृति का प्रसार तेजी से हुआ और जिसे ईसाई मिशनरियों ने ईसाई-धर्म की आड़ में खूब पोषित किया, उस पर उंगली उठाने या उसे साम्‍प्रदायिक कहने की जुर्रत तथाकथित बुदि्धजीवी वर्ग नहीं उठा पाता। अगर उन्‍हें साम्‍प्रदायिकता गम्‍भीर समस्‍या नजर आती है और उसके लिए बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं द्वारा अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों के हनन की बात वे बारम्‍बार करते हैं तो जरुरत इस क्रिया-प्रतिक्रिया की जड़ में जाकर पड़ताल करने की है। गुजरात का जनसंहार हो या हाल ही में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे, इन पर राष्‍ट्रीय सुरक्षा के बीच बैठ कर शासकीय वक्‍तव्‍य देना तो बहुत आसान है और इसके लिए तुरत-फुरत परम्‍परागत हिन्‍दू-विरोधी बयान देना भी बेशक जरुरी समझा जाता है, लेकिन बयान देनेवाले नीति-निर्धारकों, बुदि्धजीवियों और समाचार पत्रों के सम्‍पादकीय आलेख लिखनेवाले लेखकों को दंगों की असल पृष्‍ठभूमि का अध्‍ययन करना बहुत जरुरी है। यकीन से कहा जा सकता है कि अगर ऐसे अध्‍ययन निष्‍पक्ष रुप से किए जाएं तो धार्मिक दंगों के बीजारोपण के काम में कहीं भी हिन्‍दू मतावलंबी का हाथ नहीं होगा। तब हर बार बार-बार ऐसी घटनाओं के लिए घटना के दौरान आत्‍मरक्षा, अपनी सुरक्षा में हाथ-पैर चलानेवालों को दोषी कह देना और इसे भाजपा, संघ, हिन्‍दू संगठनों का आंतक बताना कहां तक और कब तक कारगर होगा? क्‍या वाकई इससे देशहित सधेगा?
ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं जो धूर्तता की ओर तेजी से बढ़ती आधुनिक बौदि्धकता के बोध में अवश्‍य आने चाहिए। राजनीतिक, शासकीय, लेखकीय, बौदि्धक अभ्‍यास देश में फैली वास्‍तविक समस्‍याओं को हल करने के लिए होने चाहिए। देश और इसके लोगों की कीमत पर मात्र अपने अहम की पूर्ति के लिए किया जानेवाला ऐसा खटचिंतन, समाजांकन केवल गंदी राजनीति का ही पोषण करेगा। इससे धर्म, वर्ग, जाति संघर्षों की अंदरुनी समस्‍याओं का हल कभी नहीं निकल सकता। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर निरन्‍तर कठघरे में खड़े रह कर सफाई देने की ऐसी सजा हिन्‍दुस्‍तान में एक हिन्‍दू को कब तक भुगतनी पड़ेगी?

Saturday, October 19, 2013

शरद पूर्णिमा के चांद का साथ


ल रात छत पर साक्षात स्‍वर्ग में होने का अनुभव हुआ। शरद पूर्णिमा का चांद बीच आसमान में चमक रहा था। धार्मिक अनुष्‍ठान कर भगवान और स्‍वर्ग तक पहुंच मोक्ष की इच्‍छा रखनेवाले अधिकांश लोग शरद पूर्णिमा के साक्षात स्‍वर्ग से अनभिज्ञ घरों में सो रहे थे। आसमान की डगर पर घड़घड़ाते लाल प्रकाश को जलाते-बुझाते इंदिरा गांधी हवाई अड्डा दिल्‍ली की ओर बढ़ते हवाई जहाज ने थोड़ी देर तक चंदा से मेरा ध्‍यान हटाया। कल्‍पना करने लगा कि हवाई जहाज में बैठे यात्रियों को पूर्णिमा का यह चांद कैसे लग रहा होगा! जहाज की खिड़की से अगर कोई यात्री इसे देखता होगा तो उसे चांद और अपना अस्तित्‍व एकसमान यानि कि आसमानी लगता होगा! हवाई जहाज कुछ ही देर में आंखों से ओझल हो गया।
फिर सोचने लगा कि चांद पर जाने के इच्‍छुक वैज्ञानिकों ने क्‍या कभी उसे उसी उन्‍मुक्‍तता से देखा होगा जैसे कि गांव घरों में लोग देखा करते थे? क्‍या कभी उन्‍होंने चांद को उस रुप में प्रस्‍तुत करने का कोई प्रमाण दिया, जिस रुप में वह धरती से नजर आता है। क्‍या उन्‍होंने ऐसा कोई नजारा दिखाया, जिसमें धरती से जैसे चांद दिखता है वैसे ही चांद से धरती भी किसी चमकते या अन्‍य आकर्षक प्रारुप में दिखे? क्‍या इस बात पर भरोसा किया जा सकता है कि मानव सभी प्रकृति रहस्‍यों को खोल के रख देगा और ब्रह्माण्‍ड के अस्तित्‍व से सम्‍बन्धित सभी प्रश्‍नों के उत्‍तर दे देगा? क्‍या प्रकृति अर्थात आकाश, चांद-तारों, सूर्य, पृथ्‍वी को वैसे ही नहीं रहने दिया जाना चाहिए, जिस रुप में वे मुझ जैसे एक साधारण प्राणी को नजर आते हैं? वैज्ञानिक दुष्‍प्रभावों से पीड़ित प्रकृति की कराह हमें क्‍यों नहीं सुनाई देती? आज देश-दुनिया में भूकम्‍प, समुद्री तूफान, जल चक्रवात आंधी, बादल फटने, अतिवृष्टि की घटनाएं बहुत ज्‍यादा बढ़ गई हैं। क्‍या इसे हमें विज्ञान प्रयोगों के कारण दर्द से बिलबिलाती प्रकृति का चि‍ड़चिड़ापन नहीं समझना चाहिए? क्‍या प्रकृति से हमारी अनावश्‍यक छेड़छाड़ तब तक नहीं रुकेगी जब तक इसके प्रतिकार से समस्‍त मानवजाति समूल नष्‍ट नहीं हो जाती? आज शहरी लोगों का इन प्रकृति विशेषताओं पर कभी ध्‍यान नहीं जाता। उन्‍हें चांद-सूरज से कोई सरोकार नहीं है। सूर्य-चन्‍द्रमा कब निकलते हैं कब डूब जाते हैं, उन्‍हें इसकी कोई लगन नहीं है।
यह सब सोचते-सोचते कितना समय गुजर गया पता ही नहीं चला। अब तक चांद का शीत प्रभाव भी फैल चुका था। हवा की शीतल, शान्‍त बयार में शरीर जैसे तितली बन कर उड़ने को तैयार था। मैं जैसे शरद पूर्णिमा के अनुभवी ताप में पिघल कर हवा में मिल गया। विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि इस रात्रि से पहले मेरा कोई जीवन था और इसके बाद भी मेरी कोई जिन्‍दगी होगी। शरद पूर्णिमा की इस रात और इसके चन्‍द्रमा को छोड़ कर जाने के लिए मन ने केवल एक बार सोचा और इनके साथ रहने के लिए आत्‍मा ने हजारों संकल्‍प कर लिए। लेकिन कम्‍बख्‍त आदमी के पास एक व्‍यावहारिक दिमाग भी तो होता है, जो उसे हर बार वास्‍तविकता के साथ समझौता करने को राजी कर देता है। मेरे साथ भी यही हुआ। एक नए हलके शरीर और पूरी तरह से बदले हुए मन के साथ मैं कमरे में आया। तीन चार घंटे घूमते-घूमते टहलते हुए चांद रात का साथ निभाया था इसलिए नींद में समानेवाली थकावट होनी स्‍वाभाविक थी। बिस्‍तर पर पसरा ही था। सोच रहा था कि छत के ऊपर आसमान और इसमें चांद चमक रहा है और अभी-अभी मैं इससे प्रभावित होकर नीचे आया हूँ। मन में हूक सी उठ रही थी कि नहीं ऊपर छत पर ही चल। दोबारा उठता, ऊपर छत पर जाता और शरद पूर्णिमा का गोल चांद देखता इससे पहले ही आंखें लग गईं। सुबह की कुनकुनी ठंड से नींद खुली तो मैंने खुद को सुखद भ्रम से जकड़ा पाया।
     
अच्‍छा लगता जब
शरद पूर्णिमा का चन्‍द्र चमकता
मखमली हवा धीमे से सरकती
पेड़-पत्तियां धीमे-धीमे हिलतीं
प्राणियों का अभिवादन करतीं
 आकाश में चमकते सुन्‍दर
चन्‍द्रमा के अन्‍दर झांक कर
 इसके दाग धब्‍बों पर अटकता
 वे भी आश्‍चर्य ही उत्‍पन्‍न करते
सद्भावनाएं बढ़ाते संवेदनाएं उपजाते
 रात छत पर टहलते हुए बीती
प्रकृति प्रेम में और कुछ न सूझी
 अमृत छिड़कती हवा अहा कितनी मधुर
आकाश जाने की ज्‍यों कोई फूलोंवाली डगर
सुगंधा संगीता संवेदना संजीविता का तरल भाव
अपने में खींचता अच्‍छाइयों का सामू‍हिक बहाव
वैर द्वेष ईर्ष्‍या जलन कुढ़न घुटन सब पर दूधवर्षा
 अन्‍दर-बाहर सब कुछ धुला उजला श्‍वेत सहर्षा
हृदय तोड़ा दिव्‍य रात्रि को दी विदाई
 कक्ष में कैद मैं मन पर शरद पूर्णिमा छाई  
शुक्रवार १८ अक्‍टूबर को शरद पूर्णिमा के उपलक्ष में।

Tuesday, October 15, 2013

धर्म और विज्ञान की विसंगति में उलझा विश्‍व (सौवीं पोस्‍ट)


स काल में प्राकृतिक रोशनी हमें वह नहीं रहने देती जो हम घर के अन्‍दर अपने लिए वास्‍तव में होते हैं। बाहर की हवा लगते ही व्‍यक्तिगत भाव, विवेक, वेदना, समझ, आचार-विचार, चेतना सब बदल जाते हैं। ऐसा क्‍यूँ होता है और यदि होता है तो यह बदलाव धनात्‍मक क्‍यों नहीं होता? कल्‍याणकारी क्‍यों नहीं होता? ऐसे व्‍यक्तित्‍व परिवर्तन से समाज-कल्‍याण और परार्थता का कार्य क्‍यूं नहीं होता? ये परिवर्तन व्‍यक्ति को नकारात्‍मक क्‍यों करते हैं? वह असंवेदनशील होकर अनावश्‍यक अभिनय क्‍यों करता है? क्‍यों वह अपने ही जैसे किसी व्‍यक्ति से वैर रखता है? क्‍यों अपनी ही जाति के प्राणी की उपस्थिति से हम असहज होकर दम्‍भी और स्‍वार्थी हो जाते हैं? यह वैज्ञानिक प्रयोगों के नकारात्‍मक परिवर्तन के कारण है। भावनाओं को कुचल कर आधुनिक बनने का जो भूत लोगों के सर पर सवार है, ध्‍यान से सोचो तो उसका कोई सार्थक लक्ष्‍य नजर ही नहीं आता। उलटे इससे अनेक सामाजिक क्रियाकलापों और धार्मिक सत्‍संगों की आड़ में संगठित तरीके से अवैध गतिविधियां चलाई जा रही हैं।

विज्ञान की चकाचौंध में नाच रही दुनिया में अगर ढोंगी साधुओं और इनके अनुयायियों की संख्‍या बढ़ रही है तो भगवान, भगवत भाव के लिए सच्‍चे मन से समर्पित लोगों को अन्‍धविश्‍वासी नहीं कहा जा सकता। ढोंगी साधुओं और इनके अनुयायियों को तो भला-बुरा कहना ठीक है लेकिन अपने घर अपने मन में ईश्‍वरत्‍व रखनेवालों को अवैज्ञानिक, पाखण्‍डी कहना उचित नहीं है। अच्‍छा व्‍यक्ति यदि धार्मिक विचारधारा का है तो उससे बढ़ कर शायद इस पृथ्‍वी पर कोई नहीं हो सकता।
कितने ही जीवन रहस्‍य खुल कर विज्ञान के द्वारा हमारे सामने आ जाएं लेकिन जीवनोत्‍पत्ति वो भी खासकर मानव-जीवन और भावों की उत्‍पत्ति कहां से प्रारम्‍भ हुई, इस तक कोई एक वैज्ञानिक, एक मनुष्‍य-दुनिया कभी नहीं पहुंच सकती। कितने ही आविष्‍कारक, वैज्ञानिक भौतिक चमत्‍कार कर इस दुनिया से चले गए। जिस दिन विज्ञान और वैज्ञानिक मनुष्‍य को अमर बना देंगे उस दिन मान लिया जाना चाहिए कि ईश्‍वर नाम की कोई सर्वशक्ति कहीं नहीं है। ढोंगी, पाखण्‍डी सन्‍तों और इनके अनुयायियों द्वारा स्‍वयं के ऐश्‍वर्य, वैभव के लिए निर्मित सिद्धान्‍तों के दुष्‍प्रभावों से दुष्‍प्रेरित होकर नास्तिक लोगों के प्रतिनिधित्‍व में ईश्‍वर को चुनौती नहीं दी जा सकती।
परस्‍पर मानवीय संवेदनाओं के अभाव में यदि कोई सज्‍जन निराकार शक्ति का अपने संबल के लिए स्‍मरण, पूजन करे और पूजा-पद्वतियां, सात्विक कर्मकाण्‍ड इसका माध्‍यम बनें और ये सब पुरातन समय से होता हुआ आ रहा हो तो इस कालखण्‍ड में जन्‍म लेकर, कुछ पुस्‍तकें पढ़ कर, कुछ विज्ञान आविष्‍कारों से प्रभावित होकर विज्ञान का ध्‍वज थामे लोग इसे पाखण्‍ड, अन्‍धविश्‍वास कैसे कह सकते हैं! जीवन के कई क्षेत्रों में विभिन्‍न उतार-चढ़ाव होते आए हैं। अब भी हो रहे हैं। मनुष्‍य के लिए कुछ का प्रभाव अनुकूल तो कुछ का प्रतिकूल होता है। प्रतिकूल परिस्थिति में हम ईश धर्म, आस्‍था, विश्‍वास को अवैज्ञानिक क्‍यों कहें! विज्ञान के पक्षधर, ईशोपासना के विरोधियों को यह याद रखना चाहिए कि उनके पूर्वजों, अभिभावकों ने धार्मिक आस्‍था के सहारे ही अपने कठिन जीवन को आसान बनाया। उनमें अगर धर्म-भाव की प्रबलता न होती, वे यदि आस्‍थागत रह कर कांटों भरी जीवन यात्रा न कर सके होते तो आज के विज्ञान-विधाता पता नहीं होते भी या नहीं।
आज जो लोग धर्म और आस्‍था को ढोंग, पाखण्‍ड का दुष्‍चक्र कह रहे हैं उन्‍हें समझना चाहिए कि धर्म की हिन्‍दू प्रणालियां स्‍वाभाविक थीं। उनमें छिपा आशय आदर्श व्‍यावहारिक जीवन का पर्याय था। कई हजारों वर्ष पूर्व सृजित पौराणिक धर्मग्रन्‍थों में उल्लिखित कथाओं के पात्रों द्वारा उन्‍नत शस्‍त्रों, उपकरणों का प्रयोग किया जाता था। पात्रों के रहन-सहन, जीवनयापन, वस्‍त्राभूषण के बारे में जो कुछ भी ग्रन्‍थों में वर्णित है क्‍या वह आज के रहन-सहन, जीवनयापन, वस्‍त्राभूषणों से किसी प्रकार से कम था? बल्कि तब के कालखण्‍ड में वैज्ञानिक सूत्र आज से कहीं अधिक विकसित थे। साथ ही उनका प्रयोग भी यथोचित था। निश्चित रुप से तब का जीवन आदर्शवाद के दायरे में सिमटा हुआ था। इसीलिए उस समय के विज्ञान के चमत्‍कार और भौतिकी के आविष्‍कार विध्‍वंशक न होकर कल्‍याणकारी ही सिद्ध हुए। आज इस सदी के विज्ञानवेक्‍त्‍ताओं के पास यदि धर्म-अध्‍यात्‍म को निराधार बताने का विशाल प्रतिनिधित्‍व है तो उसका कारण मूलधर्म अर्थात् हिन्‍दू धर्म की विसंगतियां नहीं हैं। इसका एकमात्र कारण मूलधर्म से प्रस्‍फुटित होकर बने धर्म के अनेक उपधर्म हैं। मूल धार्मिक अवधारणा के प्रतिरुप हमेशा श्रेष्‍ठ नहीं हो सकते। कालान्‍तर में इनमें विसंगतियों की भरमार हो जाती है। विसंगतियों से घिरे धार्मिक क्रियाकलाप कहीं से भी उचित नहीं लगते। दुर्भाग्‍य से आज मूल धर्म को इसके उप-धर्मों के विसंगत प्रयोगों, सिद्धान्‍तों से खतरनाक चुनौतियां मिल रही हैं और शासकीय स्‍तर पर बड़े ही हास्‍यास्‍पद तरीके से इनका बचाव किया जा रहा है।

Saturday, October 12, 2013

सपने में और इसके बाद


…….नींद से चौंक कर उठना पड़ा। देखा तो बिस्‍तर के किनारे पर मित्र दम्‍पत्ति अपनी साढ़े पांच और एक साल की बेटियों के साथ बैठे हुए हैं। ये पूछने के बजाय कि इतनी रात को आप लोग यहां क्‍या कर रहे हैं मैं उनकी ऐसी सहज उपस्थिति से नई खुशी का अहसास करता रहा। पत्‍नी ने मेरी सहजता पर मुंह बनाया और इशारों ही इशारों में बताया कि अब इनके सोने का भी बन्‍दोबस्‍त करो। बिटिया सो रही थी। उसी के बगल में दम्‍पत्ति की बेटियों को लिटा दिया गया। अपने कारण हमारे लिए तकलीफ बनने का अहसास दम्‍पत्ति को भी था। इसलिए उन्‍होंने बताना शुरु किया कि वे क्‍यों अचानक इतनी रात गए हमारे घर आ धमके हैं। रवि भाई साहब ने बताया कि दूसरे तल के घर में किसी की मौत हो गई है। प्रथम तल के हमारे घर के सामने लगे जीने से होकर ही लोग ऊपर जा रहे हैं, वहां से आ रहे हैं। हमें ऐसे माहौल में अपनी एक साल की बेटी की चिंता हुई और हमने फैसला किया कि हमें अपने घर पर ताला लगा कर आपके घर में आ जाना चाहिए। इस चिंता में मैं ये भी नहीं सोच पाया कि आपके दो कमरों के किराए के घर पर इतने लोग कैसे सो पाएंगे। उनकी बात सुन कर मैंने जल्‍दी में कोई दिलासा देना उचित नहीं समझा। मेरे दिमाग में इतना ही आया कि सबसे पहले पति-पत्‍नी को बच्‍चों सहित सुला दूं। बाकी बातें सुबह कर लेंगे। भाई साहब ने मेरी और अपनी पत्‍नी की तरफ देखा, सोते हुए तीनों बच्‍चों को सहलाते हुए कहा कि इन लोगों को सोने देते हैं और हम दूसरे कमरे में बैठते हैं। पलक झपकते ही मैं किसी दूसरे घर में प्रकट हो जाता हूँ। मुझे बताया जाता है कि कुछ दिन पहले इस घर की मा‍लकिन चल बसी हैं। जहां मैं खड़ा होता हूँ फर्श के उस हिस्‍से की ओर उंगली करके कोई बताता है कि मृत मालकिन को यहीं पर लिटाया गया था। अचानक मैं पूरे कमरे में दृष्टि घुमाता हूँ। कमरा क्‍या था ये तो चार बाई छह की कोई ऐसी जगह लगती थी जहां एक पल भी और ठहरने से मैं भी वहीं लेटा हुआ मिलता जहां मृत होकर मालकिन लेटी हुई थी…….
घटाटोप बादलों के कारण अन्‍धेरे में तब्‍दील धरती
दो ऐसे अटपटे सपने देखकर नींद इस कदर खुल गई कि आलस्‍य में बिस्‍तर पर पड़े रहने का बिलकुल मन नहीं हुआ। बाहर पौ फट चुकी है। उजाला धरती पर सब जगह फैल गया। साढ़े पांच बजे हैं। आसमान जैसे बरसने को तैयार। 10 अक्‍टूबर 2013 का ये दिन। हवा बिलकुल नहीं है। इस माह में भी तेज गति से पंखा चल रहा है। गर्मी है। मुंह धोकर बाहर पार्क में टहलने आ गया हूँ। गली से गुजरते हुए सुबह सवेरे जो भी नजर आया वो बारिश आने से पहले घटाटोप बादलों के कारण अन्‍धेरे में तब्‍दील धरती पर बहुत असहाय
बारिश के तूफान के आगे असहाय मनुष्‍य
लगता था। मनुष्‍य जीवन की सच्‍चाई जैसे इस वक्‍त भ्रमपाश में बंध गई थी।
पार्क के दो चक्‍कर लगाता हूँ लेकिन प्राकृतिक कुरुपता ने ज्‍यादा देर पार्क में रहने न दिया। टहलते-टहलते बल्‍लभ डोभाल जी के घर पहुंचा। वे घर के बाहर कुर्सी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे हैं। वहीं उनके पास बैठ जाता हूँ। बातें होने लगी हैं। थोड़ी देर हुई बैठे हुए कि बारिश की मोटी-मोटी बूंदें बरसने लगती हैं। कुर्सियां अन्‍दर ले आता हूँ। वे दरवाजा खुला छोड़ देते हैं। बाहर बारिश की मोटी जलधारें। अन्‍दर चाय की चुस्कियों के साथ बातों, किस्‍सों, विमर्श, संस्‍मरण सुनने-सुनाने का एक बेहतरीन समय गुजरता है। लगभग दो घण्‍टे जम कर बरसने के बाद पानी सड़कों पर लबालब भर गया है। पानी के बुलबुलों पर दृष्टि टिकाए हुए डोभाल जी के किस्‍से-कहानियां सुन रहा हूँ। रात जो बेतुके सपने आए उनसे नींद बुरी तरह प्रभावित हुई। इसलिए बीच-बीच में आंखें अनिद्रा के बोझ से बन्‍द हो जाती हैं। लेकिन कान तन्‍मयता से चौरासी वर्ष के अनुभव को सुन रहे हैं। इस दौरान डोभाल जी ने चाय पिलाई और हलवा बनाकर खिलाया। मुझे बड़ी शर्म आ रही थी कि डोभाल जी बुजुर्ग हैं और वे चाय और हलवा बना रहे हैं। मैंने उन्‍हें मना किया कि रहने दीजिए लेकिन वे नहीं माने। खैर हलवा खाकर अच्‍छा लगा। बारिश बन्‍द होने के बाद अपने घर की तरफ चल दिया।

Thursday, October 3, 2013

दिव्‍य-दिवस


तीसरी मंजिल का किराए का घर। घर के बाहर अहाते में खड़े-खड़े ही अद्वितीय सौन्‍दर्य से पूर्ण प्रात:काल देख रहा हूँ। पूर्व में व्‍याप्‍त सूर्य किरणों की आभा से अभिभूत। अश्विन यानि कि एक अक्‍टूबर सन दो हजार तेरह का ये दिव्‍य-दिवस। घड़ी सुबह के सवा नौ बजा रही है। अभी कुछ क्षण पूर्व ही कॉलोनी के पार्क में एक घण्‍टा व्‍यतीत करके घर लौटा हूँ। तीसरी मंजिल के घर की छत से भी ऊंचे बेलवृक्ष की दूर-दूर तक फैली, तरुण हरी कोमल पत्तियों पर सूर्य प्रकाश अनोखे आकर्षण के साथ विद्यमान है। प्रकाश के स्‍वर्णिम रंग के संग हवा मध्‍यम वेग से झूम रही है। साथ ही झूम रहा हूँ मैं अपनी आत्‍मा, अंर्तात्‍मा से। झूम रहा है सम्‍पूर्ण जग। पूर्व दिशा का आसमान नीलिमा से परिपूर्ण है। आकाश का नील निखार इसे देखनेवालों के लिए कितना मूल्‍यवान है इसकी कल्‍पना असम्‍भव है। छोटे-छोटे अंशों में आकार-प्रकार के सफेद बादलों के टुकड़े भी आसमान में यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। बादलों के टुकड़े धीरे-धीरे आंखों से ओझल होते जा रहे हैं। नभमण्‍डल में तरह-तरह के पक्षियों का विहार देख कर अपने आप से बच्‍चों जैसा हट शुरु कर देता हूँ। कि मैं इन पक्षियों जैसे ही संसार की छत, नीली विशाल छत पर क्‍यों नहीं उड़ सकता? हे संसारकर्ता तूने मानव को कल्‍पना शक्ति तो दे दी पर उड़ने की अनमोल शक्ति क्‍यों नहीं दी? मानव शरीर पर जन्‍मजात पंख क्‍यों नहीं लगाए?
     पार्क में घूमने के बाद जिस स्‍थान पर बैठ कर प्रकृति संस्‍कार देख रहा था वह मेरे लिए एकान्‍त और अनुभूतियों की आनन्‍दमय पाठशाला बन गया। इधर कुछ दिनों से एक दिन वर्षा तो एक दिन धूप का क्रम चल रहा है। इससे प्रकृति का कण-कण स्‍वच्‍छ, साफ होकर चमत्‍कृत हो उठा है। वृक्षों, वनस्‍पतियों की चमक में जैसे संजीवनी बिखरी हुई है। जो इस अमूल्‍य निधि का जितना संग्रहण कर सकता है उसे उतना संग्रहण अवश्‍य कर लेना चाहिए। हरी दूब की ताजा फुनगियों पर तैरती हवा को स्‍पष्‍ट सुन पा रहा हूँ। दूब की ताजगी, ऊर्जा को स्‍वयं में मिला कर आगे बढ़ती हवाओं के सम्‍पर्क में जो भी आता वह स्‍वस्‍थ, आनन्‍दमग्‍न हो जाता। फूलों की खिलखिलाहट में आशाओं के उजाले सुगन्‍धा बन विस्‍तार पा रहे हैं। वृक्षों के परस्‍पर संवाद कितने सार्थक लगते। पंक्तिबद्ध हो चलती चींटियों की बातें भी सुनाई दे रही हैं। बड़ा काला चींटा भी प्राकृतिक संगीत से आत्‍ममुग्‍ध है। इसीलिए वह छोटी चींटियों की पंक्ति के ऊपर से नहीं जाता। पंक्ति के पास रुक कर वापस मुड़ता है और अपना रास्‍ता बदल देता है। जहां बैठा हूँ वहां से केवल आठ हाथ दूर दो कठफोड़वे हैं। अपनी नुकीली लम्‍बी चोंचों को दूब घास के बीच घुसाते। वहां से कुछ उठाते और चोचें ऊपर कर उसे गटक जाते। बीच-बीच में सिर पर लगे कलगी जैसे पंख के डैने फैलाते और झट से समेट देते। मेरे स्थिर शरीर को देख वे निश्चिंत हो अपने कार्य को दोहरा रहे हैं। मेरी आंखें इन पर टिकी हुई हैं। कानों में इधर-उधर उड़ते, एक डाल से दूसरी डाल पर जाते, बैठते और कलरव करते पक्षियों के स्‍वर गूंजते। मनोरम पक्षी गान से कितनी शान्ति मिल रही है! दृष्टि उठा कर पक्षियों को देखा। बहुत हलके हरे और भूरे रंग की छोटी-छोटी चिड़ियों के झुण्‍ड अप्रवासी प्रतीत होते हैं। इस मौसम के अलावा और तो कभी इन पक्षियों को इस शहर में नहीं देखा था। नीलनभ, स्‍वर्णिम सूर्य प्रकाश, पावन पवन लगातार और अधिक प्रभाव उत्‍पन्‍न करने लगे। दस इंच व्‍यास के वृक्ष के तने पर गिलहरी धरती की ओर मुंह करके पसरी हुई है। रोटी के टुकड़े को तेजी से कुतर रही है। जितनी तेजी से वह रोटी कुतरती उतनी ही तेजी से दाएं-बाएं देखती। सहसा तीन कुत्‍ते गिलहरी को झपटने के लिए तेजी से दौड़ कर आए। गिलहरी सरपट रेंगते हुए पेड़ के शीर्ष पर पहुंच गई। एक कुत्‍ता पेड़ पर चढ़ने के प्रयास में अपनी आगे की दो टांगों को देर तक इसके तने पर टिकाए रहा। अन्‍त में हताश होकर तीनों वहां से चल दिए। ये मौसम का प्रभाव ही था जो गुस्‍से में कुत्‍तों के कान खड़े नहीं हुए। पूंछ हिलाते हुए वे दूर निकल गए। एक छोटा बच्‍चा अपने पिता के साथ अभी-अभी पार्क में आया। एक व्‍यक्ति पहले से घूम रहा है। अब पार्क में कुल चार मानवजीवी हैं।
धूप अब सीधे मेरे मुंह पर पड़ने लगी। आंखें बन्‍द कर लेता हूँ। काले-महरुनी रंग के मिश्रण से बने भम्रजाल बन्‍द आंखों के अन्‍दर लहराने लगे हैं। भ्रमचित्रों के कितने ही प्रकार मेरी अनुभूतियों के मित्र बनते जा रहे हैं। कर्णप्रिय गीत भी सुनाई दे रहे हैं। गीत का संगीत आसमान का रंग-बिरंगा बादल बन अत्‍यंत प्रभावित करता है। संगीत की धुनों पर ध्‍यान बढ़ते ही उसके भावों ने असीम सहजता ग्रहण कर ली है। दिमाग और शरीर का भार जैसे संगीत की स्‍वर लहर के बराबर हो गया। दर्द जैसे धूलकण बन कर संगीत लहरों के सुखद तूफान में विलीन हो गए। इस स्थिति से पूर्व का अपने होने का अहसास जैसे इस समय छिनाल बन गया। कानों को जो कुछ सुनाई दे रहा है उसमें शास्‍त्रीय रागों ने मधुरस बिखेरा हुआ है। यह श्रवण भाव आन्‍तरिक चेतना को सींच रहा है। चेतना के आयामों को उत्‍तरोत्‍तर बढ़ा रहा है। व्‍याप्‍त सूर्यप्रकाश और गीत-संगीत परस्‍पर गुंथ गए। हवा की लगन ने उनके बन्‍धन को और प्रगाढ़ बना दिया। सब कुछ, संसार और इसकी सब दिशाएं जैसे इस भाव में एकाकार हो गए। आनन्‍दानुभव ने अपने तन्‍तुओं के रेखाचित्र बनाते हुए व्‍यावहारिक स्‍वरुप ग्रहण कर लिया है। विचार ज्‍योति का प्रकाश अन्‍धेरे कोनों में भी फैल गया है। अन्‍धेरों में उत्‍सव की चमक आ गई। मैं जैसे आकाश में स्थित एक खुली खिड़की पर खड़ा हथेली पर ठुड्डी को टिकाए हुए बादलों को देखता हूँ। ध्‍वनि उत्‍पन्‍न किए बिना अत्‍यन्‍त धीमे-धीमे चलते बादलों के अस्तित्‍व से प्रेरित होता हुआ।
आज के इस अनुभव से पूर्व अपने दो पैरों की दस उंगलियों से धरती को कितना रौंद चुका था। लेकिन सोने जैसी मिट्टी को ऐसा सम्‍मान नहीं दे पाया जितना आसमान के बादलों को दे रहा हूँ। ये जानते हुए भी कि भावनाओं, भ्रम के इन बादलों की अपेक्षा धरती की मिट्टी का सच्‍चा, सार्थक अस्तित्‍व ही मेरे जैसों का जीवन आधार है। इसलिए आंखें खोलीं। मिट्टी हाथ में उठाई। इसके प्रति दायित्‍व का निर्वाह करना है यह विचार आया। झट से उठा और पार्क में बिखरे कूड़े को एकत्रित करके कूड़ादान में डालने लगा। अन्‍त में घर की ओर चला आया।