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Saturday, September 21, 2013

मोदी विरोध व समर्थन


प्रधानमन्‍त्री पद के प्रत्‍याशी के रुप में नरेन्‍द्र मोदी के नाम की घोषणा से देश में एक साथ कई प्रतिक्रियाएं उभरने लगी हैं। शरद यादव भाजपा को कॉरपोरेट कल्‍चर यानि कि निगमित संस्‍कृति से चलनेवाली राजनीतिक पार्टी बताते हैं। उनके अनुसार कॉरपोरेट सेक्‍टर के दबाव में ही नरेन्‍द्र मोदी को प्रधानमन्‍त्री पद का प्रत्‍याशी घोषित किया गया। शरद जी जहां तक कॉरपोरेट संस्‍कृति की बात है इसके सबसे बड़े पक्षकार तो नेहरु थे। आज तक यह देश इसी संस्‍कृति के बूते बननेवाली नीतियों से ही तो चलता हुआ आ रहा है। ऐसी संस्‍कृति देश के जर्रे-जर्रे में घुस चुकी है। कांग्रेस ने इस काम में सबसे बड़ा योगदान किया। कांग्रेस को छोड़ किसी अन्‍य राजनीतिक दल से उम्‍मीद करना कि वह दशकों की कुसंस्‍कृति से चलायमान भारत को एकदम से वापस भारतीय संस्‍कृति से जोड़ दे तो यह उम्मीद ऐसे ही है जैसे भगवान को साक्षात सम्‍मुख देखना। फिर जनता दल यूनाइटेड तो राजग से अलग हो चुका है। एनडीए में क्‍या हो रहा है क्‍या नहीं इस पर ध्‍यान देने के बजाय जेडीयू के अध्‍यक्ष अपने कार्यों पर ध्‍यान देंगे तो देश को ज्‍यादा उत्‍पादक विकल्‍प प्राप्‍त हो सकेंगे।  
     ज्ञानपीठ से सम्‍मानित कन्‍नड़ लेखक डा. यू. आर. अनंतमूर्ति को तो जैसे आभास हो गया है कि मोदी ही प्रधानमन्‍त्री ही बनेंगे। क्‍योंकि उन्‍होंने घोषणा कर दी है कि यदि नरेन्‍द्र मोदी प्रधानमन्‍त्री बनते हैं तो वे देश छोड़ देंगे। उनकी एक और बात पर ध्‍यान दें जिसमें उन्‍होंने कहा कि मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने से लोगों में भय व्‍याप्‍त होगा। भय इस देश के नागरिकों के लिए नई बात नहीं है। अधिकांश लोग दशकों से भय में ही तो जीते आ रहे हैं। यह भय कभी सामाजिक मूल्‍यहीनता, कभी आतंक, कभी महंगाई तो कभी अर्थव्‍यवस्‍था के चौपट होने के रुप में  गहराता ही गया है। कांग्रेस राज में देश का नागरिक जितना भयाक्रांत होता हुआ आया है उससे ज्‍यादा भय की शायद अब गुंजाइश ही नहीं रही। तो अनंतमूर्ति साहब किस भय की बात कर रहे हैं। मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने से वे किन लोगों के भयग्रस्‍त होने की बात कर रहे हैं। कहीं वे मुसलमान आतंकवादियों की बात तो नहीं कर रहे। क्‍योंकि कांग्रेस राज में देशी-विदेशी आतंकवादियों को खूब प्रसिद्धी मिलती है। देश का महत्‍वपूर्ण समय इन पर बात करने, इन्‍हें पकड़ने, इन पर मुकदमा चलाने, इनके देश से प्रत्‍यर्पण सन्धियों पर चर्चा करने, इन पर खर्चा करने, इन्‍हें जनसंचार के केन्‍द्र में रखने जैसी अनेकों गतिविधियां पर व्‍यतीत होता है। कहीं वे इस बात से तो नहीं डरे हुए हैं कि मोदी राज में ऐसी अनुत्‍पादक गतिविधियां बन्‍द हो जाएंगी। आतंकियों को हीरो बनाए बिना ही उन्‍हें तुरन्‍त दण्‍ड मिलने लगेंगे। ऐसा होगा तो आतंकवाद ही समाप्‍त हो जाएगा। लोग आराम व चैन से रहेंगे तो उन्‍हें अपने नए उपन्‍यास के कथानक नहीं मिल पाएंगे। सब ओर शांति रहेगी तो लिखने को बाकी क्‍या रहेगा। कहीं उनके भय के केन्‍द्र में ये बातें तो नहीं हैं। अनंतमूर्ति जी आप कन्‍नड़ के प्रख्‍यात लेखक हो, ज्ञानपीठ पुरस्‍कारधारक हो लेकिन दुर्भाग्‍य से मुझ जैसे तो आपका नाम या तो ज्ञानपीठ पुरस्‍कार मिलने के दिन की खबर पढ़ कर ही जान पाए थे। या आज जब आप मोदी विरोधी वक्‍तव्‍य दे रहे हैं तब ही मुझे पता चला है कि आप जैसा कोई है, ज्ञानपीठधारक है और कुछ कह रहा है। मुझे आशा है कि आपको देश छोड़ना ही पड़ेगा। वैसे आपके देश छोड़ने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। देश-दुनिया जब मूल्‍यों के बिना चल रही हो तो आपका क्‍या मूल्‍य। आपके बिना भी यह देश चलता रहेगा। हां आपसे प्रार्थना है कि मूल्‍यों को प्रतिष्‍ठापित करने के प्रयत्‍न करनेवालों को आप हतोत्‍साहित कतई न करें।  
     मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के सीताराम येचुरी। खुद तो ये सीता और राम की सन्‍तान हैं, जैसा कि इनके नाम से झलकता है। पर ये ठेठ कम्‍युनिस्‍ट हैं। ऐसे मार्क्‍सवादी हैं कि किसी बिगड़े हुए विद्यार्थी को ठीक करने के लिए यदि अध्‍यापक उसे थोड़ा सा शारीरिक दण्‍ड देते हैं तो ये विद्यार्थी के अधिकारों को लेकर खड़े हो जाते हैं। अध्‍यापक इन्‍हें आततायी, कट्टर नजर आने लगता है। बेशक ये विद्यार्थी के नकारात्‍मक अधिकारों के लिए लड़ें पर अपने को किसी महात्‍मा, सच्‍चे समाजसेवक से कम नहीं समझते। ऐसी पार्टी के येचुरी ने मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने या न बनने दोनों स्थितियों को ध्‍यान में रख कर अपनी सुविधानुसार टीका की है। नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर इन्‍हें जनता का निर्णय स्‍वीकार्य होगा और यदि मोदी प्रधानमन्‍त्री नहीं बनते हैं तो इस प्रश्‍न का इनका उत्‍तर अगर-मगर पर टिका होगा। क्‍योंकि इन्‍हें ये भी तो देखना है कि अगर राजग को गठबन्‍धन में इनकी जरुरत पड़ेगी तो ये उससे जुड़ने को सहर्ष उपलब्ध रहेंगे और यदि कांग्रेस सत्‍ता में आती है तो उस स्थिति के अनुरुप भी तो इन्‍हें अपनी उपलब्‍धता बचा कर रखनी होगी। तब इनके मार्क्‍सवादी सिद्धांत एक कोने में धूल फांकेंगे।
     नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने पर उपरोक्‍त तीनों महाशयों की टिप्‍पणियां स्‍वार्थवश दी गई हैं और इनका कोई विशेष औचित्‍य नहीं है। लेकिन सर्वोच्‍च नयायालय के पूर्व न्‍यायाधीश वैद्य नाथपुरा रामकृष्‍ण अय्‍यर ने मोदी का समर्थन करके इस बहस को रोचक और महत्‍वपूर्ण बना दिया है। उनके अनुसार मोदी स्‍वराज के सिद्धांतों पर चलनेवाले व्‍यक्ति हैं। वे भारत से गरीबी दूर करने की योग्‍यता और नीतियां रखते हैं। स्‍वराज के माध्‍यम से वे भारत को एक नई दिशा देने में पूर्णत: सक्षम हैं। उनके अन्दर समाजवादी और गांधीवादी मूल्‍य समाहित हैं। धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदारों को शायद वैद्य जी का कथन बुरा लगे। क्‍योंकि हिन्‍दू राष्‍ट्र में यदि हिन्‍दू संस्‍कृति के सहारे राष्‍ट्र को चला कर न केवल हिन्‍दुओं बल्कि यहां रह रहे तमाम अन्‍य धर्मावलम्बियों के कल्‍याण की बातें हो रही हों और इनके लिए त्‍वरित नीतियां भी बन रही हों तो वोट बैंक में अपने चालू खाते के बन्‍द होने के डर से कुछ तथाकथित राजनीतिक दलों, इनके अनुयायियों और इनके पत्रकारों को कष्‍ट होना स्‍वाभाविक है। 

11 comments:

  1. बढ़िया विश्लेषण
    आभार आदरणीय -

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  2. बहुत सार्थक विश्लेषण..

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  3. बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है .
    मोदी के विरोध में बोलकर वे लोग भी लाईट में आना चाहते हैं जिन्हें अब तक कोई जानता भी नहीं था.
    कभी गुजरात में रहने वालों से पूछो कि मोदी एक मुख्यमंत्री कैसे हैं ..उन्हें स्वयं अपनी शंकाओं के जवाब मिल जायेंगे.वहां के बेहतरीन हाईवे/विश्व के सबसे बड़े सोलर एनर्जी प्लांट की परियोजना /स्त्रिओं की सुरक्षा व्यवस्था आदि की तारीफें यहाँ भी प्रिंट मीडिया में छप चुकी हैं .गुजरात के विकास की ये सभी तस्वीर क्यूँ मिडिया नहीं दिखाता?

    ऐसा लगता है वर्ग विशेष को 'मोदिफोबिया' हो गया है.
    भविष्य में राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम हों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेरी यही कामना है.

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  4. बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है विकेश जी,रोचक एंव पठनीय आर्टिकल।

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  5. मेरी तो समझ में ही नही आया कि डा. अनन्तमूर्ति की समस्या क्या है । ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक के मुँह से ऐसे विवेकशून्य वक्तव्य पर हैरानी होती है ।

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  6. बस उस देश की कल्पना करता हूँ जिसमे कोई किसी के लिए द्वेष ना रखे और सब विकासरत हों. जो दिक्कतें है वो हम सबको मिलकर ही ठीक करना होगा आरोप प्रत्यारोप से परे.

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  7. modi ki deshbhakti par koi sandeh nahi par moi ne gujrar men lokayukt banane se mana kar diya tha. rajnitik dalon ko rti ke dayre me lane virodh me vah kuch nahi bole sarkaar ke janpratinidhitiv kaanun ke sansodhan ke maale vah kuch nahi bole.vaise aapka modi par vishlesan bhut achha hai

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  8. शायद कभी मोदी बोल गये थे कि राह चलते रहने पर कुछ न कुछ भौकते ही रहते हैं..जब समय निर्णायक है ही तो बेकार भौंकना क्यों ?

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  9. देश में जो हो रहा है, और जो होना है, और पिछला क्या है, इसकी पूरी पड़ताल
    बहुत सार्थक,सच के साथ की है
    कमाल का विश्लेषण
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

    सादर

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  10. दोनों तरफ से सार्थक विश्लेषण विकेश जी। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा प्रत्येक चिंतक, विचारक राजनीतिक अखाडे में कुद पडेगा और बाचन करने लगेगा। हर एक को विरोधी और समर्थनीय बातें चिपककर आती है, मोदी कैसे अछूते रहेंगे। पर हम सभी एक बात समझते हैं कि प्रत्येक पांच बरस बाद राजनीतिक सत्ता परिवर्तन होना चाहिए।

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  11. एकदम सटीक अवलोकन और उसका प्रभावी विवेचन ....आमतौर पर विरोध तो चुनावों के समय हर पार्टी का होता है इस बार किसी एक व्यक्ति के विरोध में स्वर सुनाई देते हैं, उस पार्टी की नीतियों के खिलाफ नहीं ...

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