महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, September 18, 2013

प्रकृति में दोपहर


श्विन मास की यह स्थिर सुन्‍दरता दृष्टि को भी स्थिर कर रही है। ग्रीष्‍म और शीत के प्रचण्‍ड प्रभाव से विरक्‍त यह प्रकृति सम-शीतोष्‍ण बनी हुई है। शहरों में यद्यपि गर्मी है परन्‍तु ग्राम्‍य परिवेश इस वातावरण में पूर्णत: सन्‍तुलित है। यानि कि वहां पर न गर्मी न ठण्‍ड। धीरे चलती हवा। दिन-रात, सूर्य-चन्‍द्रमा, हरिभूमि की प्रकीर्तिमा और इनके सान्निध्‍य में भाग्‍यशाली गांववासी।
नोएडा नगर के मेरे आवास-स्‍‍थल में सुबह-सवेरे ही घर में व्‍याप्‍त सूर्यप्रकाश। धूप का ऐसा निखार कि उसे देखने के लिए रुकना पड़ता। भाव-विचारों में डूब कर उसके लिए सुन्‍दर विशेषण ढूंढने में जुट जाता। हरियाली, हरे-भरे वृक्षों से गुंथी हुई धूप और इसकी पीताभा मेरे अनगिन द्वंद्वों पर आकर्षण का पानी फेर देती। शरीर को स्‍पर्श करते हुए बहती हवा जैसे स्‍वास्‍थ्‍य का वरदान दे रही है। जैसे रोगी काया पर साक्षात अमृत बरस रहा हो। सिर से लेकर पैरों के तलवों तक के सारे कष्‍ट क्षण में विलीन हो गए हों जैसे।
     बाहर विस्‍तृत असीम आकाश का निर्मल रुप, नीला सौन्‍दर्य भौतिकवाद के रोग से पीड़ित लोगों को स्‍पर्श करते ही स्‍वस्‍थ कर दे रहा है। आकाश से प्रस्‍फुटित, प्रसारित सूर्य और इसका प्रकाश मन की कालिमा को मिटा उसे उज्‍ज्‍वल कर रहा है। अन्‍ध दौड़, व्‍यस्‍त दुनिया से बच कर मैं इन अतिविशिष्‍ट प्राकृतिक उपक्रमों को देख पाने में सक्षम हूँ। ये स्थिति मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं। प्रकृति के लिए स्‍वयं की ऐसी उपलब्‍धता से लगता जैसे मैं सब ओर से सम्‍पन्‍न हूँ। जैसे मेरे लिए कोई कमी कहीं है ही नहीं।
     दिन का कौन सा समय सबसे अधिक आकर्षक होता है। इस प्रश्‍न के उत्‍तर में लोग स्‍वास्‍थ्‍य, खानपान, मनोरन्‍जन के उद्देश्‍य की पूर्ति के अनुसार सुबह या शाम को ही सबसे अच्‍छा बताएंगे। लेकिन मेरा मत है कि दिन के दोपहर-समय में मानवीय व्‍यक्तित्‍व, भावना और दर्शन सबसे अच्‍छी स्थिति में होते हैं। इस स्थिति से जो आकर्षण उत्‍पन्‍न होता है शायद उससे अधिक आकर्षण दिन के किसी और समय में नहीं होता। इस समयावधि के दौरान तेज भौतिक बहाव में बहते मानव-जीवन में जो संवेदनायी ठहरावस्थिरता साकार होती है, उसमें जीवन विशेषकर मानव जीवन सर्वोपयुक्‍त होता है। इस दौरान मानव निर्मित परस्‍पर गड्डमड्ड बुराइयां वाष्‍प बन उड़ जाती हैं। एक ऐसा भावनात्‍मक केन्‍द्र बिन्‍दु मनुष्‍य के विवेक में उभरता है, जो अपने चारों ओर परोपकारी भाव की तरंगें प्रसारित करता रहता है। ऐसे भाव आधुनिक समय को परिचालित करनेवाले समाज के प्रतिनिधियों को अवश्‍य ग्रहण करने चाहिए। यदि वे निरन्‍तर इन्‍हें आत्‍मसात करेंगे तो जीते जी व मौत के बाद के जिस स्‍वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा अरबों लोगों ने सहेज रखी है, उसे व्‍यवहार बनने में समय नहीं लगेगा। मनुष्‍य उस स्‍वर्ग को जीते जी ही खुली आंखों से देख सकेगा।
     मैंने सितम्‍बर माह की इस दोपहर से प्रभावित हो जो कल्‍पना लोक बनाया और कल्‍पना लोक को व्‍यावहारिक बनाने का जो मार्ग सुझाया क्‍या उसका निर्माण इतना सुगम है? क्‍या मुझ जैसों के जीवित रहते-रहते लोगों को नकारात्‍मक भौतिकी की लम्‍बी गहरी खाई से निकलने का कोई अवसर प्राप्‍त हो सकेगा? दिन-दोपहर के जो अनुभव मैंने बांटे वे शायद मेरे जैसे बहुत कम लोगों को ही अच्‍छे लगते हैं। अधिकांश मनुष्‍यों का इस दिशा में सोचने का मार्ग ही बहुत पहले अवरुद्ध हो चुका है। तब कैसे प्रकृति और मानव के मध्‍य स्‍वाभाविक प्रेम सम्‍बन्‍ध बना रह सकेगा? जब भौतिकवाद की आन्‍धी दिन दुगुनी रात चौगनी गति से संसार में बह रही हो तो दोपहर जैसे प्रकृति के अनुभवों को मानव कैसे अपने अंत:स्‍थल में बसा सकेगा? यह विचार मुझे संसार के सभी प्राणियों की ओर से डराता है, भयाक्रान्‍त करता है।  






14 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (19-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 121" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

    ReplyDelete
  2. इस मनोरम दोपहरी में नासिका भी एक मदमाती सुगंध से फरकती रहती है . संभवत: नवरात्री की प्रतीक्षा में...मनभावन शब्द-चित्र..

    ReplyDelete
  3. बेहतरीन प्रस्तुति विकेश जी।

    ReplyDelete
  4. साहब, आप तो पहाड़ के आदमी हैं.... धूप, हवा, हरियाली, पेड़, पौधे के बीच सांस लेने वाले लोग... आपके एहसास में शामिल होकर हम भी कुछ पल के लिए तरोताजा हो उठते हैं...
    बहुत सुन्दर पोस्ट है आपका....

    ReplyDelete
  5. इस दोपहर का मज़ा तो विद्यार्थी जीवन में बहुत लिया है लेकिन अब,अब तो प्रकृति के संग जीना हम कब का भूल चुके हैं फिर क्या सुबह क्या दौपहर और क्या शाम सब कुछ मशीनरी जो हो गया है। इस सो कॉल्ड आधुनिक युग में...बढ़िया आलेख!

    ReplyDelete
  6. सूर्य निकटतम रहता है तो अधिक प्रकाश हो जाता है।

    ReplyDelete
  7. अति सुन्दर पोस्ट. शरतकालीन चन्द्र पर तो व्यास जी ने एकाधिकार कर लिया और बांकी बचे चाँद को शेष कवियों ने लूट लिया. ऐसे में दोपहर के सूरज के प्रति आपका पोस्ट पढकर बहुत अच्छा लगा. साथ ही पूरे माहौल का चित्रण भी.

    ReplyDelete
  8. दोपहर का मज़ा सुबह ओर शाम से कम नहीं ... हमारे दुबई में तो अधिकाँश ऑफिस दोपहर १ से ४ तक बंद रहते हैं फिर ४ से ७ तक खुलते हैं ... जब मेरा ऑफिस भी ऐसे ही था (अब नहीं है) तो दोपहर का भरपूर मज़ा लेते थे हम परिवार सहित ... यादों के झुरमुट से कुनमुनाती दोपहर को निकाला है आपने ... लाजवाब ...

    ReplyDelete
  9. सुबह के हलचल और शाम के अस्ताचल के बीच के समय दोपहर बड़ा ही सुहाना होता है और
    वो भी इस मौसम में …….

    ReplyDelete
  10. बेहतरीन शब्द चित्र... सच है आज हम भौतिक सुविधाओं के पीछे भागते हुए प्राकृतिक सौन्दर्य से कितने अनज़ान हो गए हैं...

    ReplyDelete
  11. सच ..दोपहर भी इतनी भा सकती है किसी को..यह आज जाना.
    कुछ अलग सा पढने को मिला ,आभार.

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards