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Friday, June 7, 2013

नक्‍सलवाद से निपटने के अनुचित तरीके



पिछले साल जून महीने की बात थी जब छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ और नक्‍सलियों के बीच हुई गोलीबारी में 20 नक्‍सली मारे गए थे। विगत शनिवार की शाम को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की गीदम घाटी में नक्‍सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हमला किया। इसमें कांग्रसे पार्टी के 30 से अधिक कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। कई लोग घायल हुए। एक साल के दौरान हुई इन दो बड़ी खूनी दुर्घटनाओं के अलावा नक्‍सलियों, सेना व पुलिस के बीच सालभर छोटी-बड़ी अनेक मुठभेड़ की घटनाएं तो बहुत आम बात हो गई हैं। इसी का परिणाम है कि आज फिर से हमने नक्‍सलियों द्वारा किए गए बड़े जनसंहार को देखा और इस पर अपनी चिंता प्रकट करने और इसके आगे न झुकने जैसे रटे-रटाए सरकारी वक्‍तव्‍य सुने।
     मानुषिक वेदना पर आज आधुनिकता की ऐसी घोर काली परत चढ़ गई है, जिसके नीचे दूर देश के कोने में हुई या हो रही मरने-मारने की दुर्घटनाओं का विडंबनात्‍मक सच दम तोड़ रहा है। जिन्‍हें आज हम नक्‍सली कह रहे हैं, ये कौन हैं? हमारे भाई, साथी, देशवासी होते हुए भी इन्‍होंने नक्‍सलपंथ क्‍यों चुना? क्‍या ये पागल हैं जो इन्‍हें बंदूकों, बारुद, बमों, आदि से खूनी खेल खेलना पसंद है? क्‍या हमारी सरकार द्वारा कभी इनके नक्‍सल-अस्तित्‍व उभार के बिंदुओं पर गौर से विचार किया गया कि इनके ऐसे मार्ग पर चलने के कारण क्‍या हैं?
अगर विचार करें तो यही निष्‍कर्ष निकलेंगे कि भूख, बीमारी से त्रस्‍त और नागरिक सुविधाओं, अधिकारों से वर्षों तक वंचित रहनेवाला, समाज की मुख्‍यधारा से अलग-थलग पड़े रह कर अपने लिए हमेशा सरकार की ओर से कुछ होने की उम्‍मीद पालनेवाला तबका कब तक धैर्य की परीक्षा देता! अंत में उनका धैर्य सरकारी तंत्र की अनदेखी, विश्‍वासघात और टाल-मटोल के रवैये से टूट गया और वे ऐसे मार्ग पर निकल आए, जहां उनकी आत्‍मा, अस्मिता, नैतिकता, मौलिकता उन्‍हें एकजुट होकर वह सब करने को तैयार कर गई, जिसके चलते उन्‍होंने ससम्‍मान न सही देशद्रोह के नाम पर ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अन्‍यथा तो वे करबद्ध रह कर याचना का बारंबार अभ्‍यास करते हुए ठगे ही जा रहे थे।
हो सकता है कि अब नक्‍सलियों का उद्देश्‍य पथभ्रष्‍ट हो गया है। उनके कारनामों को आंतक फैलाने का दुस्‍साहस या देशद्रोही गतिविधि बताया जा रहा है। परन्‍तु उनकी पहले और बाद की दोनों स्थितियों के लिए ढुलमुल सरकारी रवैया ही जिम्‍मेदार है। पाकिस्‍तानी आंतकियों को तो हम साक्ष्‍य, पूछताछ और आंतक-तंत्र तक पहुंचने का आधार बता कर खूब पाल-पोस रहे हैं, समय काट रहे हैं पर विवशता में नक्‍सली बने भारतीयों और मजबूरी में उनसे जूझ रहे भारतीय सेना, पुलिस के जवानों के आपसी खूली खेल को हमेशा के लिए बंद करने हेतु कुछ नहीं कर रहे हैं।
आम आदमी के नक्‍सली बनने के इतिहास पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि 2 मार्च, 1967 को पश्चिम बंगाल के दूर-दराज के गांव नक्‍सलबाड़ी में एक जनजातीय नौजवान विमल किसान ने न्‍यायिक आदेश मिलने के बाद मुक्‍त घोषित अपनी भूमि को जोतने की कोशिश की तो एक स्‍थानीय भूस्‍वामी ने भाड़े के बदमाशों के साथ मिल कर उस पर जानलेवा हमला कर दिया। नक्‍सलबाड़ी क्षेत्र के जनजातीय लोगों ने उन पर पलट कर हमला कर दिया और अपनी-अपनी भूमि को पुन: कब्‍जाने लगे। परिणामस्‍वरुप एक बड़ा विद्रोह उठ खड़ा हुआ और देखते-देखते एक पुलिस निरीक्षक सहित नौ जनजातीय लोगों की हत्‍या हो गई। उस समय दो माह की छोटी सी अवधि में यह घटना भारत सहित पूरी दुनिया में आग की तरह फैल गई।
तब से लेकर अब तक समय-समय पर केवल नक्‍सलियों द्वारा ही नहीं बल्कि माओवादी, आदि विद्रोही संगठनों द्वारा भी अपने अधिकारों के लिए सरकारी नीतियों के विरोध में भारत में अनेक विद्रोह किए गए। सरकार ने स्‍पष्‍ट नीति के अभाव में इस विषय को सुलझाने के कई प्रयास भी किए पर वे व्‍यावहारिक कम और औपचारिक अधिक सिद्ध हुए। आज दशकों पुराना यह सरकार, शासन विरोधी आंदोलन,जब तक नेताओं पर हमले जैसी घटना न हो, बस एक आम घटना बन कर रह गया है। यह देखते हुए भी कि अब तक इस संघर्ष में अनगिन नक्‍सलियों, सेना और पुलिस के जवानों की जानें जा चुकी हैं और लगातार लाशों के अंबार लग रहे हैं, सरकार की चिंता मामले को पूरी तरह से हल करने की परि‍णति तक नहीं पहुंच सकी है। आधुनिक भारत निर्माण की ताल ठोकनेवाले, मीलों हम आ गए मीलों हमें जाना है के जुमले उछालनेवालों को खुद से पूछना होगा कि परिवर्तन रैली पर हुए नक्‍सली हमले की जड़ें कहां हैं। नक्‍सली जंगली जानवर नहीं हैं। मिसाइलों, आधुनिक शस्‍त्रों की नई से नई प्रौद्योगिकी अपने पास होने पर अभिमान, गर्वोक्ति से भर उठनेवाले भारत की सर्वोच्‍च संस्‍था के संचालकों को सोचना होगा कि नक्‍सलियों के पास भी आधुनिक अस्‍त्र-शस्‍त्र मौजूद हैं। यही नहीं वे इनको चलाने में सिद्धहस्‍त भी हैं। यहां तक कि वे गोरिल्‍ला प्रशिक्षण भी प्राप्‍त कर चुके हैं। जब वे अपने लोकतान्त्रिक प्रतिनिधियों की तरह ही उनके शस्‍त्र प्रेम को अपने स्‍तर पर बनाए हुए हैं तो उन्‍हें मूर्ख, नासमझ, हिंसा का चुनाव करनेवालों के रुप में परिभाषित करना कहीं से भी युक्तिसंगत नहीं लगता। उनके विरुद्ध आक्रामक होने के बजाय सरकारी नीति उन्‍हें मुख्‍य धारा में सम्मिलित कर उन्‍हें सुविधा, अधिकार संपन्‍न बनाने की होनी चाहिए। परस्‍पर खूनी खेल पर निश्चित रुप से हमेशा के लिए विराम तब ही लगाया जा सकेगा।

12 comments:


  1. यही तो कुटिलता है, एक हिंसा उचित और एक हिंसा अनुचित्…… यदि हिंसा से समाधान नहीं है तो पहले अभावों की मारी बहाने की हिंसा को रूकना चाहिए, जब वाकई मानते हों कि अपने प्रति हिंसा अनुचित है। यथार्थ में तो हिंसा कोई भी हो, निकृष्ट कार्य ही है। चाहे किसी बहाने की जाय!!

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  2. बिलकुल यही तो हुआ है आखिर हर चीज़ की एक सीमा होती है कोई कब तक चुप बैठ सकता है। हा पहले उनका उठाया हुआ कदम सही लगता था मगर अब ज़रूर पद भ्रष्ट ही लगता है। इसमें सारी गलती सिर्फ सिर्फ सरकार की है यह कहना भी गलत होगा क्यूंकि कुछ हद तक यह लोग खुद भी जिम्मेदार हैं।
    मैं यह नहीं कहती की सभी गलत है मगर सभी सही भी नहीं है क्यूंकि इनमें से ही कुछ ऐसे भी है जो ताकत अर्थात बंदूकों और हत्यारों के बल पर अपने गलत मंसूबों को आंजाम देना चाहते हैं।

    रही इंसाफ की बात तो पहली बात इंसाफ पाने या मांगने का यह कोई सही तरीका नहीं दूसरी बात सीएचएनडी लोगों की वजह से हजारों बेकसूर लोग भी गेंहु के साथ घुन की तरह पिस जाते है और मारे जाते हैं। खून का बदला खून नहीं होता और ना ही होना चाहिए। मेरे हिसाब से तो कानून में सख्ती और परिवर्तन की जरूरत है।

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  3. भाई प्रशासन में सब अंधे, गूंगे, चोर, उच्चके, घूसखोर और नामर्द बैठे हैं | उन्हें अपनी जेब गरम करने से फुर्सत हो तो वो देश की मार्मिक दशा और बदहाली पर एक नज़र डालें | लेख लिखना, बोलना, भाषण देना बहुत सही है | मैं तो कहता हूँ नक्सली सही कर रहे हैं जो हाथ जोड़ कर इल्तजा करने से नहीं माने, बात सुनकर नहीं माने ऐसे प्रशासन को तो जड़ से उखाड़ देना चाहियें चाहे फिर तरीका कैसा हे क्यों न हो | ये सब मरते हैं तो मरें कम से कम ऐसे कीड़ों से देश को तो निजत मिलेगी |

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  4. नक्सलियों के प्रति अपनी नीतियों को सरकार को बदलना चाहिए.इस में समाजशास्त्रियों से भी राय लेनी चाहिए.
    उनकी इतनी मजबूत स्थिति बिना किसी स्थानीय सहायता के नहीं हो सकती.इसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.

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  5. आज जिन्हें नक्सली माना जा रहा है वह मूलतः भारत का अधिकारिक नागरिक है और उसके अधिकारों को नकारे जाने का परिणाम देश भुगत रहा है। राजनीतिक लोगों की गलत और लुटारू मानसिकता के कारण छोटे सवाल भी बडे बने हैं। आपने सही समय पर आलेख लिखा जरूरी है सारे दिशाविहिन राजकर्ताओं के पास पहुंचे।

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  6. समाज में हमेशा एक तबका रहा है जिसका शोषण होता आया है. शोषण के खिलाफ आवाज़ तो उठानी ही चाहिए. अन्यथा प्रजातंत्र क्यों? लेकिन तलवार हाथ में ले कर ही आवाज़ उठाई जाए यह जरूरी नहीं.

    नक्सली आन्दोलन जहाँ से शुरू हुआ था वहां से आज तक के सफर में बहुत पड़ाव आये हैं. मुझे उसका वर्तमान स्वरुप दिशाहीन और उनके लिए अनिष्टकारी दिखता है.देश के अन्दर लामबंद होकर विद्रोह तो समझ आता है. लेकिन समनांतर सरकार चलाना, जिसके मूल्य हमारी संवैधानिक व्यवस्था से इतर हो, जिसमे बच्चों, युवाओं, महिलाओं को शोषण के नाम पर खुद शोषित किया जा रहा हो वो कहाँ से स्वीकार्य हो सकता है. अपने देश में रहकर अपने पड़ोस के मॉडल चलाना कभी संभव नहीं हो सकता. जरूरत है उनको हिंसा त्यागकर समाज के मुख्यधारा में आने की कोशिश करना.शेष देश के आग्रह को सुनना. दिक्कतें तो हैं दूसरी जगह भी लेकिन लेकिन इस बेमतलब के आपसी आपसी संहार से निर्दोषों की जान बचेगी.नफ़रत में कमी होगी.

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  7. किसी भी आतंकवाद की तरह नक्सलवाद भी खुद ही ऊपर से नीचे तक अनुचित ही है। हत्या, फिरौती, यौन शोषण, श्रम शोषण, तस्करी, अराजकता और आतंकवाद को किसी भी कारण की आड़ देने की कोशिश की जाये, वह अनुचित और अस्वीकार्य ही रहेंगे।

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  8. सरकार के अपेक्षा के शिकार जनता आज नक्सली उपज है उसके परिणाम सभी भुगत रहें है सरकार के इससे निपटने का तरीका गलत है... अच्छी आलेख प्रस्तुति !!

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  9. किस पर दोष मढ़ें,
    किसके तर्क पढ़ें।

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  10. सरकार को यह समझना बहुत जरूरी है कि जब तक पिछडे व वंचितों की समस्याओं का अन्त नही होगा , उन्हें न्याय और सही अधिकार नही मिलेगा विकास और शान्ति की बातें बेमानी हैं ।

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  11. शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना उचित है लेकिन हिंसा कभी भी किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकती...

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  12. समस्या का उचित समय समाधान न निकले तो हद से बाहर हो जाती है ... और अपनी सरकार पहले ढील देने में विश्वास करती अहि फिर कुचलने में ... अधिकतर समस्याएं इसलिए जीवित रहती हैं ... नक्सल, भिंडरावाला, आतंकवाद, काश्मीर, का किसी भी समस्या को देख लें ...

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