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Saturday, May 25, 2013

आज की जरुरत बुद्धमार्ग का अनुसरण


र्तमान कालगति को बुद्धवाद की सबसे अधिक आवश्‍यकता है। पूंजी कुचक्र के लिए विश्‍वग्राम में परिवर्तित दुनिया जिस गति से जीवन की स्‍वाभाविकता खो रही है, उससे भविष्‍य अन्‍धकारमय दिख रहा है। मुद्रा पोषित संसार वास्‍तविक श्रम की भी अनदेखी कर रहा है। तन-मन-धन से कार्य के प्रति समर्पित व्‍यक्ति आज संघर्षों तले पिस रहा है। संवेदनशील विचारों को सच्‍चे मन से कोई भी प्रोत्‍साहित नहीं कर रहा है। संवेदनशीलता भी एक प्रकार के बनावटी पूर्वाग्रह से लिपटी हुई है। स्थिति ये है कि अच्‍छाई के लिए स्‍पन्दित मनुष्‍य को अपनी जीवन डोर पकड़े रखने के लिए कुण्ठित हो बुरे आचार, व्‍यवहार का संगी होना पड़ रहा है। मन से सच्‍चा, सज्‍जन आदमी जब विवश हो बुरी दिशाओं में अग्रसर होगा तो निश्चित ही विनाशकारी कुण्‍ठा पनपेगी। ऐसे में बुद्धवाद ही वह रास्‍ता नजर आता है, जिस पर चल कर मनुष्‍यगति को समुचित बनाया जा सकता है।
बुद्धत्‍व को जानने के लिए इसके अस्तित्‍व कालखण्‍ड से लेकर अब तक के समय की तुलना करें तो ज्‍यादा प्रभावी निष्‍कर्ष निकल कर आएंगे। महात्‍मा बुद्ध एक राजा के पुत्र होकर, सभी जीवन सुविधाओं और राग-रंगों से परिपूर्ण होते हुए भी जीवन के भ्रम को पहचान गए। उन्‍हें अधिशासी अनुभव नहीं भाया। वे अधिकार निर्माता, आदेश देनेवाले राजा की तुच्‍छ स्थिति को निष्‍प्रभावी करते हुए नए जीवन संकेत फैला गए। आज के सन्‍दर्भ में देखें तो अधिकार प्राप्‍त मन्‍त्रीगण, अफसर या कर्मचारी खुद को, जीवन को उस दृष्टि से देखने की अंशमात्र कोशिश भी नहीं करते, जो बुद्ध ने आत्‍मसात की। आज अगर चारों ओर मानवता को मुंह चिढ़ाती परिस्थितियां हाहाकार मचाए हुए हैं तो कितने लोग उनसे या उनको पैदा करनेवालों से उस प्रकार निपट रहे हैं, जिस प्रकार बुद्ध ने अंगुलिमाल जैसे निर्मम हत्‍यारे से सम्‍वाद कर उसे वापस मानवधारा में शामिल करने का महान कार्य किया। यह साधारण बात नहीं है। एक हत्‍यारा जो कई लोगों को मारकर उनकी अंगुलियों की माला पहनने की विकृति से पीड़ित था, उसकी विकृति को एक नवदिशा प्रदानकर बुद्ध ने संसार को सर्वोत्‍कृष्‍ट संदेश दिया। उन्‍होंने उन पूर्वाभासों का दमन किया, जो एक मूढ़ के साथ सही सम्‍वाद स्‍थापित करने में आड़े आ रहे थे। उनकी रचनात्‍मक विचार जागृति, नव आत्‍मोत्‍पत्ति ने अंगुलिमाल को सर्वप्रथम उसके नजरिए से देखा। इस तरह वे थोड़े समय के लिए उसके आचार-व्‍यवहार में उसके साथ हो लिए। इसी से अंगुलिमाल को बुद्ध की हत्‍या करने से पूर्व उन्‍हें रुककर देखना, सुनना और समझना पड़ा। असंख्‍य लोगों को मौत दे चुका व्‍यक्ति अपने नए आखेट के लिए उसकी बात क्‍यूं सुनता, लेकिन उसे जब यह लगा कि सम्‍मुख खड़ा महात्‍मा मृत्‍यु से भयभीत होने के बजाय उसकी ओर देख मुस्‍कुरा रहा है, उसकी भावी क्रिया को एक प्रकार से उचित ठहरा रहा है तो उसे हिंसा से विलग हो स्थिर होना पड़ा। यहीं इसी बिन्‍दु पर वह अपनी हिंसात्‍मक प्रतिक्रिया के बजाय सम्‍मुख खड़े बुद्ध को देखने लगा। बुद्ध को इतना ही समय चाहिए था उसके परिवर्तन के लिए।
हम सबको अपने आसपास फैले विषैले माहौल और उनके पालकों के प्रति यही भाव जगाना होगा। विकृत मानसिकता, अपराधियों की अनदेखी करने से वे अपने पाप कर्मों के लिए दुगुने दुस्‍साहस के साथ आगे बढ़ेंगे, जबकि हमें चाहिए कि हम उन्‍हें भी उसी सम्‍यक मानव दृष्टि से टटोलें जो हम अपनों के लिए रखते हैं। अपराधियों के प्रति उपजी सज्‍जन मनुष्‍यों की इस अप्रत्‍यक्ष सद्भावना को निश्चित रुप से सकारात्‍मक प्रतिक्रिया मिलेगी। और जब ऐसा होगा तो नवजागरण के तन्‍तु अपराध-दुष्‍प्रेरणा को जड़मूल नष्‍ट कर देंगे। मनुष्‍यों के अच्‍छे-बुरे सिद्धांतों की निरन्‍तर लड़ाई से जीवन-शांति के हल नहीं निकल सकते। अच्‍छे पक्ष को उदारता अपनानी होगी। इतना सर्वग्राही बनना होगा कि वह बुराई से सीधे ईर्ष्‍या करने के बजाय उसके घटना-तत्‍वों की गहरी पड़ताल करे। बुराई के घटना-तत्‍वों की जड़ों में मट्ठा डाले और बुरे कार्य करनेवालों को अपने में मिला ले। ऐसा घटित होगा तो निश्चित रुप से नकारात्‍मक वातावरण में उल्‍लेखनीय कमी दिखेगी।
महात्‍मा बुद्ध का जीवन, दर्शन आज की प्रचण्‍ड बुराइयों के सामने मजबूती से खड़े होने का समर्थन करता है। बुद्धवाद विध्‍वंस, वैमनस्‍य, विद्रूप के मूल घटकों से थोड़े समय तक इसलिए तारतम्‍य स्‍थापित करने का आहवान करता है, ताकि उनको चिन्हितकर उनके निराकरण का मार्ग प्रशस्‍त हो सके। यदि अवरुद्ध को इस उक्ति से मुक्‍त किया जाए तो क्‍या बुरा है! जीवन के प्रति जो दृष्टि सर्व प्रकार से सम्‍पन्‍न महात्‍मा बुद्ध ने अपनाई, उसे आज की मानवता-विरोधी स्थितियों में स्‍वीकार करने और उस पर कुछ दूर तक चलने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। ना सही बुद्ध की तरह घरबार छोड़ने तक का निर्णय हो, पर गृहस्‍थ बने रहकर कम से कम वह आध्‍यात्मिक विचार तो अपनाया जाए, जिससे अन्‍धेरे में प्रकाश की आशा हो। हम कब तक अव्‍यावहारिक मानवीय पहलुओं और कल्‍याण तक सिमटे रहेंगे। परोपकार, सहयोग और बन्‍धुत्‍व के आधार पर निर्मित हो सकनेवाला जीवन सदैव दिवास्‍वप्‍न ही क्‍यों बना रहे! यह जितनी जल्‍दी साकार हो उतना बढ़िया है।
विकेश कुमार बडोला

16 comments:

  1. एक समसामयिक अच्छा आलेख, रही बात आज के इस दूषित मानवमूल्यों के वक्त में महात्मा बुद्ध का अनुशरण करने की तो बस यही कहूंगा कि काश ऐसा हो पाता ! आज कलयुगी दुराचारियों ने महात्मा बुद्ध का भी व्यावसायीकरण कर दिया है राजनीतिक फायदे के लिए !

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  2. महात्‍मा बुद्ध का जीवन, दर्शन आज की प्रचण्‍ड बुराईयों के सामने मजबूती से खड़े होने का समर्थन करता है।
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    badhiya likha aapne..

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  3. आज के कलुषित समाज में महात्मा बुद्ध के दिखाए रास्ते से ही हमारा जीवन में बदलाव सम्भव है.बेहतरीन आलेख.

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  4. सही कहा आपने महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन का थोड़ा सा अंश भी हम अपना ले तो दुनिया का कायाकल्प हो जाय. अभी हम जिस व्यवस्था से गुजर रहें हैं इस समय महात्मा बुद्ध का जीवन दर्शन ही हमें सही रास्ता दिखा सकता है और नितांत जरुरी भी हैं .अच्छी आलेख.

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  5. सहमत आपसे .सकारात्मक परिवर्तन का सूत्र लिए है यह पोस्ट .ॐ शान्ति .

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  6. बहुत सुन्दर भगवान् बुद्ध का जीवन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है | मैं आपके इस लेख से सहमत हूँ | बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति |

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  7. सही कहा आपने ज़रूरत तो है कि हम उनके जीवन दर्शन का एक अंश भी अपना लें तो बहुत कुछ बादल सकता है मगर हमारे समाज कि यह विडम्बना है कि कहते सब हैं करता कोई नहीं। मैं तो कहती हूँ महात्मा बुद्ध तो बहुत बड़ी हस्ती थे हम तो केवल अपने आसपास ही किसी एक इंसान से कुछ अच्छा सीख कर उसे ही अपने जीवन में अपना लें तो बहुत है। वरना उदाहरण तो महात्मा गांधी और मेरे सबसे प्रिये कबीर दास जी का भी हैं। मगर लोग उनके दिखाये हुए रसस्ते पर चलना चाहे तब न ....

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  8. मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभवयुक्त किशोर नहीं है।

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  9. बुद्ध की राह पर चलकर हम बोधिसत्व तो बन ही सकते हैं . ताकि इस समष्टि का कुछ तो दुःख कम हो सके . जो करुणा और मैत्री से संभव है .

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  10. धन अर्जन की अंधी दौड़ में किसे परवाह है ऐसे सोचने की. बहुत सुन्दर लिखा है.

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  11. काश कि ऐसा हो पाता..

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  12. महात्मा बुद्ध का सन्देश आज भी उतना ही सार्थक है, अगर हम उसका अनुसरण कर सकें...बहुत विचारोत्तेजक आलेख...

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  13. उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
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  14. बुद्ध के मार्ग पर चलना उतना ही मुश्किल है जितना गान्धी के मार्ग पर चलना । फिर भी अगर व्यक्ति दूसरों के अधिकार व स्वतन्त्रता का सम्मान करे , दूसरों को सुधारने की जगह हर व्यक्ति खुद को सुधारे तब भी वह इन महान आत्माओं की राह में एक कदम होगा । अच्छे विचार , अच्छा आलेख ।

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  15. सकारात्मक सन्देश के साथ ...महात्मा बुद्ध के जीवन दर्शन को आज के परिवेश से जोड़ते हुए गंभीर लेख .. दिशा परिवर्तन समाज की आवश्यकता है आज ...

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