महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, April 20, 2013

अपना दु:ख मैं ना बोलूंगा




आकाश का घन, मेरा मन
 अपना दु: मैं ना बोलूंगा
दूजे की सुनता जाऊंगा
अपनी अपने मन में रहेगी
वहीं उठेगी वहीं दबेगी
अपना दु:ख बतलाए बिना,
कितने ही मर जाते हैं
अपना दु:ख बतलाने वो,
फिर कब धरती पर आते हैं
ऐसा ही मानव बन जाना
मैंने भी है सीख लिया
कब दु:ख के तानेबाने ने
हमको सच्‍चा प्रेम दिया

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर सरल शब्दों में आपने मनो भावों को व्यक्त किया है. सुन्दर.

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  2. बहुत ही सरल सहज परिभाषा दे दी है आपने
    जीवन डोर को मजबूती से थामे रहने की....
    पहली बार आपके ब्लॉग पर आना सार्थक रहा...
    धन्यवाद....

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  3. बिना बोले ही दुःखों को भोगा जाता है। दुःखों का प्रकटिकरण करके सामने वाले को दुःखी करने में कोई मजा नहीं। सीधे-सरल भावों में लिखी सफल कविता। पर ऐसी भी कई गमियां होती है जो व्यक्त होना जरूरी होती है और सुनने वाला साथी भी मिल जाता है तब दुःख हल्के भी होते हैं।

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  4. सीधी सच्ची बात। रहिमन निज मन की व्यथा ...

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  5. बहुत सुन्दर. आपकी पंक्तियाँ पढ़ हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ याद आ रही है जो उन्होंने मिलन-यामिनी में लिखी थी और बहुत प्रेरणादायी है-

    हर दंत समय का जो लगता
    मानो, विष दंत नहीं होता
    दुःख मानव के मन के ऊपर
    सब दिन बलवंत नहीं होता

    आहें उठती, आँसू झड़ते
    सपने पीले पड़ते लेकिन
    जीवन में पतझड़ आने से
    जीवन का अंत नहीं होता

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  6. मेरा भी ऐसा ही मानना है के अपना दुःख किसी के साथ नहीं बांटना चाहियें परन्तु सुख और ख़ुशी सभी के साथ बांटनी चाहियें | अपना दुःख हमेशा अपना ही रहना चाहियें पराया नहीं होना चाहियें | आभार विकेश भाई बहुत ही बेहतरीन और गहन अर्थ लिए आपकी रचना | बधाई

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  7. मेरा भी ऐसा ही मानना है के अपना दुःख किसी के साथ नहीं बांटना चाहियें परन्तु सुख और ख़ुशी सभी के साथ बांटनी चाहियें | अपना दुःख हमेशा अपना ही रहना चाहियें पराया नहीं होना चाहियें | आभार विकेश भाई बहुत ही बेहतरीन और गहन अर्थ लिए आपकी रचना | बधाई

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  8. मेरा भी ऐसा ही मानना है के अपना दुःख किसी के साथ नहीं बांटना चाहियें परन्तु सुख और ख़ुशी सभी के साथ बांटनी चाहियें | अपना दुःख हमेशा अपना ही रहना चाहियें पराया नहीं होना चाहियें | आभार विकेश भाई बहुत ही बेहतरीन और गहन अर्थ लिए आपकी रचना | बधाई

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  9. बहुत सुन्दर रचना विकेश भाई | दुःख सदा अपना ही होकर रहे तो बेहतर होता है और सुख, ख़ुशी सभी के | मेरा भी यही सोचना है और मानना है के अपने दुःख में किसी और को क्यों दुखी किया जाए | दुःख हमेशा अपने अन्दर रहे वही अच्छा है | बहुत ही उम्दा और गहन अर्थ लिए आपकी रचना | आभार

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  10. वासी तो सच ही कहा है ... दुःख सुनने वाले सच्चे सारथि भी तो नहीं मिलते हैं आज ...
    सरल ओर सादे शब्दों में मन को लिखा है ... जो कईयों की भावनायों के अनुरूप है ...

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  11. अप्रतिम शब्द ...बेहद ही सहज सरल शब्दों में अपने मन मिजाज को रखा...बढ़िया और बढ़िया ...

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  12. कुछ बातें ऐसी भी होती है जो बिना कहे भी सुन ली जाती है .

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  13. खुबसुरत अभिव्यक्ति
    लेकिन मेरा अनुभव है
    कोई तो ऐसा होता है
    जिसे कह देने से
    दुःख भी कम होता है

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