Wednesday, April 24, 2013

आलेख पर मेरी टिप्‍पणी



नसत्‍ता में 23.04.2013 को मुद्रित कृष्‍णदत्‍त पालीवाल का आलेख पढ़ा। लेखक ने आज के भारत के सन्‍दर्भ में गांधी जी और नेहरु के मतैक्‍यों का उल्‍लेखनीय मूल्‍यांकन किया है। गांधी जी और नेहरु के वैचारिक टकराव और फलस्‍वरुप व्यवहृत होनेवाले साम्राज्‍यवाद ने अंत में नेहरु को ही उनके मूल्‍यहीन सिद्धांत के लिए आधुनिकता, उत्‍पादन, पूंजी मानसिकता के नौसिखियों के मध्‍य महिमामण्डित किया। गांधी जी की हिन्‍द स्‍वराज की मूल्‍य-पोषित अवधारणा को ऐसे तिरष्‍कृत किया गया मानो नवसाम्राज्‍यवाद के उपासक नेहरु सहित अनेक मूल्‍यभ्रष्‍ट नेताओं, लोगों को आधुनिकतावाद के पूंजी-यंत्र पूजकों से अमर-अजर होने का मंत्र मिल गया था। लेकिन हुआ क्‍या! जीवन मूल्‍यों की समृद्धि के पक्षकार गांधी जी और उद्योग-यंन्‍त्राधारित दुनिया बनाने के विघ्‍नपालक नेहरु दोनों के मानव शरीर आज अविद्यमान हैं। मूल्‍य-पोषित जीवन के पक्षधर गांधी के मूल्‍य तो आज भी, यदि समझे जाएं तो, अत्‍यन्‍त प्रासंगिक हैं। पर नेहरु के सिद्धांत की पहचान आज उन लोगों को भी नहीं रही, जो उनके निर्देशित कुपथ पर चलते हुए अंतत भोगवाद में स्थिर हो गए हैं और मार्गदर्शक या देश की तो छोड़ दें, वे अपनी पहचान और व्‍यक्तित्‍व तक को भी खो चुके हैं।

      ग्रामाधारित संस्‍कृति यदि गांधी के सिद्धांत के अनुसार फलित होती तो हो सकता था अभी तक दुनिया में पुन: दूध की नदियां बहने लगतीं। हो सकता है मनुष्‍य मानव-मूल्‍यों से लद कर ऐसा परमशरीर बन जाता, जो सर्वथा कल्‍याण प्राप्ति और अर्पण मति का संवाहक होता। यह अनुमान नहीं है। यदि गांधी के निदर्शन पर चला जाता तो निश्‍चय ही ऐसा होता। लेकिन नहीं बहुराष्‍ट्रीयता के नाम पर, असभ्‍यता के वाहक पश्चिम देशों ने सभ्‍यता और मानवोचित मूल्‍यों के पालक भारत को भी भारतीय कांग्रेस के नेतृत्‍व में एक भोगवाद की अपसंस्‍कृति में परिवर्तित कर दिया है। कहने को तो हम एक विश्‍वग्राम में परिवर्तित हो चुके हैं। परन्‍तु मानवीय अवधारणा, संकल्‍पना में हम स्‍वयं से भी विलग हो चुके हैं। मात्र उपभोग के लिए समर्पित और इस हेतु तैयार एक उत्‍पाद बन चुके हैं।

      जैसे प्रत्‍येक व्‍यक्तित्‍व में एक कमी होती है, उसी प्रकार गांधी जी में भी एक कमी थी। उन्‍होंने सरदार भगत सिंह और चन्‍द्र शेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारियों के राष्‍ट्र संचालन सूत्रों को अपने हिन्‍द-स्‍वराज के सिद्धांत के सा‍थ मिल जाने दिया होता, और तत्‍पश्‍चात राष्‍ट्र निदर्शन तैयार होता तो निश्चित रुप से आज के भारत की स्थिति गांधी जी और नेहरु के वैचारिक टकराव के कारण नेहरुमय (गई गुजरी) न होकर गांधी जी और क्रान्तिकारियों के सर्वोच्‍च सिद्धांतों से मिल कर रामराज्‍य के समान होती।



 

10 comments:

  1. एक दम सटीक लेख विकेश भाई | जो इंसान खुद ही भुक्तभोगी रहा हो अपने सारे जीवन में वो देश को इससे ज्यादा और क्या दे सकते हैं | मैं तो कहता हूँ दोनों में से किसी को भी देश के साथ खिलवाड़ करने का कोई हक नहीं था | भगतसिंह, चंद्रशेखर, सुभाष और उनके जैसे कितने ही देश भक्तों के कातिल हैं इनके जैसे लोग और ये खुद | देश के पतन के ज़िम्मेदार भी यही लोग हैं | बचपन में हमें गलत शिक्षा दी गई बापू और चाचा पढ़ा कर | शुक्र है आज की पीढ़ी को असलियत मालूम है चोर उचक्कों की | वो गलत शिक्षा का शायद समर्थन नहीं करेंगे | उम्मीद है देश के हालात कभी तो सुधरेंगे | सुन्दर एवं सटीक लेखन और करारी टिपण्णी | आभार

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  2. एक दिशा से बादल छाटो, दूजे दौड़ चले आते हैं।

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  3. यह बात तो तय है कि नेहरु और गांधी के आपसी टकराव का खामयाजा
    आज तक भुगता जा रहा है
    आपने सटीक बेवाक प्रतिक्रिया लिखी है।इस देश की नयी पीढ़ी को सही सार्थक जानकारी होनी
    चाहिये और इसके लिये इस तरह की सच्चाई से भरी बातें उनके सामने आना चाहिये।

    आपके लेखन में तेज धार है,बरक़रार रहना चाहिये
    बधाई और शुभकामनायें

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  4. लेख सत्यापरख और सार गभित है. बढ़िया लेखनी.

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  5. नेहरु की सच्चाई जानने के लिए फुर्सत से Alex von Tunzelmann की लिखी किताब INDIAN SUMMER: The Secret History of the End of an Empire कभी ज़रूर पढियेगा. बहुत अच्छे से शोध करके लिखा हुआ है.

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  6. बहुत ही सारगर्भित और सटीक आलेख,आभार.

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  7. बहुत सार्थक और सटीक चिंतन...

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  8. और हर उत्पाद का केवल मार्केटिंग ही रह गया है..

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  9. पंडित नेहरू और महात्मा गाँधी के चरित्र में बहुत ज्यादा फर्क नहीं था. हाँ ..अपने-अपने तरीके से दोनों ने स्वांग रचा .... उसकी कीमत आज तक चुकानी पड़ रही है ......

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  10. महान लोगों की जो चीज़ प्रभावित करती है...वो है उनकी अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्धता...उस देश-काल में उन्हें जो सही लगा...उसके प्रति वो अडिग रहे...बेहद विचारणीय पोस्ट...

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