महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, April 21, 2013

राख भावनाओं पर अवाक राष्‍ट्र



बेबस बचपन


लेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से मोहभंग हुए तीन वर्ष व्‍यतीत हो गए। हिन्‍दी समाचार पत्रों को मात्र भाषा मानकों का अध्‍ययन करने हेतु लेता हूँ। जनसंचार माध्‍यमों द्वारा दी जानेवाली भ्रष्‍टाचार, बलात्‍कार, नकार, विकार सम्‍बन्‍धी सूचनाएं प्राप्‍त कर हम क्‍या करेंगे! बुराईयों के विरुद्ध लड़ने, कुछ करने के हमारे अधिकारों को जब कानूनी पहेलियों में उलझा दिया गया हो। कानून एक नि:शक्‍त अवधारणा के अतिरिक्‍त कुछ भी प्रतीत नहीं हो रहा हो। तब इस का उपहास करने की विवशता ही जनता के पास होती है। ऐसे में लोकतान्त्रिक मानदण्‍ड निजी राय और विचार थोपने तक ही सिमट कर रह गए हैं। जनकल्‍याण की बात तो दूर की है अपने हाल पर भी लोगों को रहने नहीं दिया जा रहा है। व्‍यतीत छह दशक सत्‍ता-प्रतिष्‍ठानों के नेतृत्‍व में जनमानस की मिट्टी को ऐसे विकृत करते हुए निकले हैं, मानो इस समयकाल के नेतृत्‍वकर्ताओं को मनुष्‍य से अधिक हिंस्र पशुओं को बसाने की चिंता रही हो।
     दो राय कहां हैं इसमें कि नेतृत्‍वकारों को मनुष्य से अधिक पशुओं की चिंता है। वो भी जितना अधिक हिंस्र पशु होगा, उसकी उतनी अधिक चिंता होगी। उस पर आवश्‍यकता से अधिक मुद्रा और समय खर्च करने के बाद भी तन्‍त्रात्‍मक अधिपति विचलित नहीं होते। उन्‍हें ज्ञात है इसकी भरपाई भी उसी सज्‍ज्‍न समुदाय के श्रमदान से होगी, जो अनेक माध्‍यमों से हिंस्र पशुओं की हिंसा झेल रहा है। अचानक हुई गोलीबारी में मरें अपने लोग। परेशान हों उनके सम्‍बन्‍धी। देश, समाज, अर्थव्‍यवस्‍था सब पर पड़े अतिरिक्‍त चिंता का भार। समुचित साक्ष्‍य होने पर भी दोषी को मृत्‍युदण्‍ड देने के लिए सरकार विवश। तब गोलीबारी करनेवाले पर कानून चार-पांच वर्ष तक अपना न्‍यायिक अध्‍ययन करता है। सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान आतंक-तन्‍त्र तक पहुंचने का सूत्र बताकर उसकी सेवा-सुश्रूषा करता है।
चार माह पूर्व जिन पशुओं ने बसंत विहार सहित दुनिया को विकृत किया था और उससे पूर्व, उस समय तक, उसके बाद और अब तक उन जैसे पिशाच विकृति की जिन नई पराकाष्‍ठाओं को नित लाघंने पर लगे हुए हैं और दण्‍ड के नाम पर उनका समय आराम से व्‍यतीत करवाया जा रहा है, उससे सज्‍जन मनुष्‍य की दशा-दिशा दिग्‍भ्रमित हो गई है। सीधे व्‍यक्ति का विवेक तिरोहित हो गया है। अब फिर एक बार और जब हमारे कान दिल्‍ली, गांधी नगर, बच्‍ची, पांच वर्ष, बलात्‍कार, बसंत विहार से भी जघन्‍य अपराध जैसे शब्‍द-युग्‍मों को सुन रहे हैं और मन-मस्तिष्‍क इन सबसे क्षुब्‍ध हो कर इनकी अनदेखी कर देश से दूर कहीं जंगल में जाने का विचार कर रहे हैं, तो आत्‍मा की ध्‍वनि पर रुक कर हमारा दूसरा मन हमसे विकराल-विपरीत परिस्थितियों से लड़ने को कहता है।
     लेकिन मैं परिस्थितियों से युद्ध करने की भावना के इस ज्‍वार से बाहर आता हूँ तो कुछ और ही पाता हूँ। परिस्थितियों से लड़ने का विचार इतना कमजोर है कि दिन के चौबीस घंटे तक भी यह स्थिर नहीं हो पाता। जबकि अपसंस्‍कृतियों के आक्रमण से तहस-नहस भारत को, इसके निवासियों को विकृतियों के जड़मूल नाश हेतु सदियों तक निरंतर संघर्ष करने की जरुरत है। क्‍या मैं, आप और हम सब इसके लिए तैयार हैं? पिशाचों को पराजित कर जीवन को साफ-सुथरा बनाने का हमारा संकल्‍प निश्चित रुप से हमारी भावनातिरेक के बने रहने तक है और इसके निरंतर बने रहने की आशा बहुत कम है।
     कार्यालय कैंटीन में एक साथी के साथ पीड़ित बच्‍ची के बाबत गुमसुम शब्‍दों में विमर्श हो रहा था। दूर दूसरी टेबल पर बैठे व्‍यक्ति को विमर्श के विषय का भान हो आया था। निकट आ कर बैठते ही उसने कहा, "लद्दाख में चीनियों ने चौकी लगा ली है। यहां एक बच्‍ची के साथ हुई दुर्घटना पर ही सारा राष्‍ट्रीय तामझाम लगा हुआ है। परिणाम क्‍या होगा ये सभी जानते हैं। चार माह पूर्व के पिशाचों का क्‍या हुआ। ये तो पीड़ित के अभिभावकों ने पुलिसवालों से पैसे नहीं लिए इसलिए मामला आग बन गया। वरना इस देश में ये नई बात थोड़े ही है। इस चहुंओर के शोर में अब भी कई स्‍थानों पर मासूमों, अबलाओं पर अत्‍याचार हो रहे होंगे। उनकी चिंता कौन करेगा! उन्‍हें सुरक्षा, सुविधा, चिकित्‍सा कौन देगा! तुर्क, मुगल, अंग्रेज सबने भारत पर राज किया है। एक बार चीन को भी मौका देने में क्‍या बुराई है। स्‍वयं के बनाए गए नियमों पर ढंग से चलना तो अभी बहुत दूर की बात है। हम तो अंग्रेजों के छोड़े गए देश चलाने के तरीकों को ही ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं। जब यहां वालों ने कुछ नहीं करना तो चीन आए या जापान क्‍या बुराई है! कम से कम आधुनिकता को संभालने का उनका तरीका तो यहां के लोगों को पसंद आ ही जाएगा। रही देशभक्ति की बात तो वह छोटे बच्‍चे तक के लिए एक गंदा चुटुकुला बनी हुई है"। मैं उस व्‍यक्ति के मुख से नई और विचारणीय बात सुन कर अवाक था।

12 comments:

  1. हालात बद से बदतर हो गए हैं...मीडिया, सत्ताधीश और प्रशासन सभी मिलकर अपनी-अपनी बजा रहे हैं... आम आदमी तो बस सब कुछ झेल रहा है ...यह तय है कि एक दिन गुबार फूटेगा ...अभी सिर्फ बानगी दिख रही है...

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  2. चीन के जिन शासकों को खुद चीनी पटक-पटक कर मारने के प्रयासों में लगे हैं, जिन्हें उन दानवों में भी आशा की किरण दिख रही हो उनका मालिक कौन हो सकता है और उनका मुस्तकबिल क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है। इस देश को अनेक युद्ध लड़ने हैं, सीमाओं पर भी और भितरघातियों पर भी ...

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  4. समस्या की जड़ में कहीं न कहीं हम आप ही हैं. समाज में जो बुराइयां फैली है उसके खिलाफ हम में से कितने आवाज़ उठाते हैं. रिश्वतखोर भी हमारे समाज में ही है और रिश्वत देने वाले भी. दहेज लेने वाले भी और देने वाले भी. हम ऐसे कई लोगों को जानते भी हैं लेकिन फिर भी हम में कितने को ज़रुरत है उनको बेनकाब करने की. दहेज़ की समस्या उत्पन्न ही ना हो अगर हर होनेवाला वर बगावत करे अपने परिवार वालों के साथ. लेकिन क्या हम करते हैं? रिश्वतखोरी हो ही नहीं अगर हम हर चीज श्रम और इमानदारी से अर्जित करने का प्रण करें.लेकिन हम में से कई पैसे के बूते छोटे रास्ते से निकल जाना चाहते है.

    इसलिए कानून बेमतलब है. ये भ्रष्ट नेता भी तो हम आपके से ही जाते है संसद. लेकिन फिर भी उम्मीद है. देश में जो जागरण हो रहा है वो अच्छी बात है. ये हल्ला शुरुआत ही सही लेकिन अच्छी बात है की कम से कम हल्ला तो हो रहा है. अगर ये निजी चैनल वाले नहीं होते सो सरकारी न्यूज़ में शायद खबर भी ना आती.

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  5. आपकी इस प्रविष्टि क़ी चर्चा सोमवार [22.4.2013] के 'एक गुज़ारिश चर्चामंच' 1222 पर लिंक क़ी गई है,अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पधारे आपका स्वागत है |
    सूचनार्थ..

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  6. निशब्द हैं हम सब ...जैसे बस एक खेल खेला जा रह है और सत्तासीन लोग अपने स्वार्थ साध रहे हैं

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  7. गहन और गंभीर चर्चा। देश के भीतर जो पाशविकता मीडिया के माध्यम से हमारे पास पहुंच रही है वह अत्यंत भयानक है। ऐसी घटनाएं पहले भी घटित होती थी पर मीडिया के मर्यादा के कारण हमारे पास पहुंचती नहीं थी। लेख में आपने चीन और जापान या अन्य विदेशियों के आने के बात कहीं है। चाहे वह पास बैठे आगंतुक व्यक्ति के माध्यस कहीं हो। देशी सत्ता हो या विदेशी या हम राज करें, कोई फर्क पडेगा नहीं कारण हम भारतीयों ने लगता है कसम खाई है बुरे से बुरा बनने की। बडे अफसोस के साथ लिखना पड रहा है देशी लोगों में जो हैवानियत, शैतानियत और संवेदनहीनता बैठी है वह नष्ट होने के आसार तो नहीं लग रहे हैं।

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  8. दिखावा के जमाने में शब्द भी एक दिखावा है,कैसा हो सजा जिस से भय पैदा हो ,देखिये
    latest post सजा कैसा हो ?
    latest post तुम अनन्त

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  9. हालात में सुधार के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे..कुछ दिन शोर होगा और फिर वैसे का वैसा..सभी राजनीतिक दल अपनी अपनी रोटियां सेक रहे हैं, किसी को आम जनता की चिंता नहीं..आवश्यकता है लड़कियों के प्रति सोच में आमूल परिवर्तन की, जिसकी शुरुआत हमें अपने घरों से करनी होगी.

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  10. हालात बदतर है

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  11. अवाक होने के अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं..

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  12. जब हर क्षेत्र में एफ डी आई को आमंत्रित किया जा रहा है...तो राजनीति में क्यों नहीं...ग्लोबल टेन्डर करना चाहिए...५ साल के कांट्रेक्ट पर...कम से कम हम नेता बदल तो सकेंगे...

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