Wednesday, April 17, 2013

अवचेतन मन का प्रवाह



दोस्‍तों की याद के साथ, शाम और रात का मिलन
ठोस व्‍यस्‍तता के बावजूद एक बार फिर मन को बाहर उड़ेलने बैठा हूँ। दिन के रात में मिलने और परिणामस्‍वरुप उभरनेवाले प्रकृति प्रभावों को देख घर में आने का मन नहीं हुआ। काम के बोझ का विचार विवश कर गया अन्‍दर आने को। लेकिन तब भी ठान ली कि आज ब्‍लॉगर दोस्‍तों के लिए कुछ लिखूंगा। गर्मी है पर दिन ढलने पर चलती, लगती हवा ने नवप्राण दे दिए। 
    छुट्टी का दिन था आज। सोचा एक घंटे सो जाऊं। नींद में उतरा ही था कि लगा जैसे कोई मुझे हिलाते हुए उठा रहा है। अज्ञात सपनों को पकड़ने की कोशिश में आंखें नहीं खोलीं। सात सेकंड तक खाट सहित हिलता रहा तो देखना पड़ा कौन है। कोई नहीं था। भूकंप आ रहा है, तुझे भी लगा, मैं तो यहां बैठा हुआ था, मैं तो टीवी देख रही थी, जोर-जोर से सब हिलने लगा-ऐसी आवाजें सुनाई दीं तो बाहर देखा लोग सड़क पर आए हुए थे। दोपहर सवा से साढ़े चार के बीच का समय था ये। 
     एक महीने पहले तक हरे पत्‍तों से सघन घर के सामनेवाले बेलवृक्ष के पुराने हरे-पीले पत्‍ते सूख कर झड़ रहे हैं। उसकी शाखाएं ऊपर से धीरे-धीरे खाली हो रही हैं। पके अधपके बेल अब साफ दिखाई देने लगे हैं। गिरे हुए पत्‍तों को नीचे रहनेवालों ने इकट्ठा कर जलाने का उपक्रम बनाया हुआ है। छत पर टहलते हुए शाम का रात में बदलना देखता रहा। झड़झड़ खड़खड़ करके झकझोर कर हिलता बेलवृक्ष हवा आने, उसके स्थिर रहने का संचार माध्‍यम बना हुआ है। पश्चिम आकाश के भाग में ऊपर अर्द्धचन्‍द्र, पहरेदारों के रुप में उसके दाएं-बाएं खड़े सितारों को अभी दिन रहते-रहते देखना एक उत्‍ताल भावना से  गुम्फित करता है। नभमंडल में चांद के निकट छितरे हुए पारदर्शी सफेद बादल देखते-देखते अदृश्‍य हो जाते हैं। आकाश के पूर्वी भाग पर सफेद बादलों के बड़े-बड़े चित्रखण्‍ड अब भी मौजूद हैं। दूर आधुनिक अट्टालिकाओं से गुंथा हुआ आसमान संध्‍या और रात्रि मिलन के लिए अपरिभाषित रंगों का मिश्रण बना हुआ है।
     ब्‍लॉगर मित्रों के साथ एक जानकारी साझा करनी है यह विचार अचानक दिमाग में आया और मैं आकाश, चांद-सितारों को बाद में देखने के संकल्‍प के साथ कमरे में आ कर कम्‍प्‍यूटर पर बैठ गया हूँ। एक हिन्‍दी अखबार में ब्‍लॉग जगत, सूचना प्रौद्योगिकी के खिलाड़ियों के लिए कुछ अच्‍छी खबर थी। शनिवार 13 अप्रैल 2013 को इसमें प्रथम पृष्‍ठ के सबसे नीचे (खुद ही तय करें, मौत के बाद कौन पढ़े ई-मेल) शीर्षक से खबर आई थी। इसमें किसी ई-मेल धारक के निधन के बाद उसके ई-मेल अधिकारों के हस्‍तांतरण, किसी के द्वारा मृतक के ई-मेल और उससे सम्‍बन्धित आंकड़ों के गलत प्रयोग की आशंकाओं को समाप्‍त करने के क्रम में गूगल के (इनेक्टिव अकाउंट मैनेजर) के बाबत लिखा गया था। ब्‍लॉगर दोस्‍तों के लिए मैं वह लिंक यहां लगा रहा हूं। हिन्‍दुस्‍तान
     गूगल के इस भावनात्‍मक निर्णय के लिए मन में खुशी का संचार हुआ था। लगा कि मेरे मन में कुछ दिन पहले तक जिन ब्‍लॉगर मित्रों की राजी-खुशी की कामना के साथ भविष्‍य में उनसे विलग होने की जो बुरी परन्‍तु सच्‍ची भावना जागृत हुई थी, उसको साझा करने का समय आ गया है। ये कैसा अनुभव होता है कि जिन मनुष्‍यों को हम अपने आसपास गतिमान देखते हैं, एक दिन वे यादें बन जाते हैं। यादें शब्‍द से पहले मात्र इसलिए नहीं लगाया कि किसी की (यादें) उसकी मनुष्‍यगति से अधिक सशक्‍त होती हैं। जीते जी यदि कोई व्‍यक्ति समुचित सत्‍कार नहीं पा सका हो, लेकिन जीवन-पराजय मिलने पर उससे अनजान व्‍यक्तिगण भी अपनी स्‍मृतियों में उससे निस्‍वार्थ, निष्‍छल, निष्‍कपट भाव-सम्‍बन्‍ध बनाते हैं। मुझे और आपको कई बार ऐसा लगता नहीं कि कभी कहीं आते-जाते चाहे-अनचाहे देखे गए, केवल देखे गए किसी गुजर चुके व्‍यक्ति की याद अचानक आ जाती है। आधुनिकता, समय की कमी, दुश्चिंताओं के कारण ऊपरी तौर पर बेशक हम स्‍वयं को स्‍वार्थी समझें या अपनी व्‍यक्तिगत कमियों के चलते अपने को दुत्‍कारें कि जो होना, किया जाना चाहिए वह नहीं हो रहा है। पर हमारे अवचेतन मन का प्रवाह बड़ा ही विचित्र है। उसमें सभी के लिए चिंताएं हैं। उसकी पकड़ तात्विक तो है परन्‍तु वहां स्थिरता संकुचित हो जाती है। वह हर गतिविधि के ठीक होने, प्रत्‍येक मनुष्‍य के सुखी होने की कामना में चिंताओं का ऐसा बियाबान बन जाता है, जो अनचाहे ही अग्नि की चपेट में आकर भष्‍म हो जाता है।
     वैसे तो ऐसी भावनाएं कविताओं के माध्‍यम से ज्‍यादा मुखर हो कर बाहर आतीं। पर मैं देर में और अत्‍यन्‍त संवेदन होने पर अचानक लिखी जानेवाली कविता तक अपने मन की कहने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए संस्‍मरण को आधार बनाया। एक-दूसरे के ब्‍लॉग पढ़ने, परस्‍पर टिप्‍पणियां करते रहने के फलस्‍वरुप इस जगत से गहन लगाव हो गया है। इसलिए अब अपने अंत:करण में प्रभु स्‍मरण करते हुए उनकी कृपादृष्टि को ब्‍लॉग दुनिया के मित्रों तक फैलाने, बनाए रखने की प्रार्थनाएं करता हूँ।

19 comments:

  1. विकेश भाई ऐसे ख्याल तो अक्सर मेरे दिल में आते जाते रहते हैं | दिमाग इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि दिमाग तो मुझमें है ही नहीं | शायद प्रभु यह कृपा करना भूल गए मेरे साथ | आपने जो भी लिखा बयां किया काफी हद तक सटीक और सत्यापित है | अकबारों में आजकल खबर नहीं छपती हैं वो तो सिर्फ एक मार्केटिंग का जरिया बने हुए हैं | इसलिए मैंने तो अकबर लेना ही बंद कर दिया और न ही न्यूज़ देखता हूँ | थोडा बहुत जो इन्टरनेट पर खबर देख पढ़ लेता हूँ वही सही है | बाकि गूगल शूगल कुछ भी करे हमारी बला से | सेंटीमेंटल होना अब छोड़ दिया दुनिया ने इतना कुछ दिखा दिया के मेंटल होना मंज़ूर है पर सेंटी नहीं | इसलिए आप भी मस्त रहे मलंग जोगी की तरह और ऐसे भावों और ख़बरों पर ज्यादा तवज्जो न ही दिया करें | प्रभु बैठे हैं सबकी चिंता करने के लिए ऊपर | और जब चिंता का कोटा खत्म हो जायेगा तो चिता फूँक दी जाएगी और उनके पास जाने का न्योता न चाहते हुए भी मंज़ूर हो जायेगा | तो जस्ट चिल्ल चिल्ल का मन्त्र अपनाएं और सदा खुश रहे | आबाद रहे | आभार | कुछ ज्यादा कह गया हूँ तो माफ़ कीजियेगा |

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  2. अब तो यह सोचकर लिखना होगा कि कल कोई पढ़ भी सकता है...पर जिस गति से गूगल सुविधायें बन्द कर रहा है, लगता है कि पहले यही बन्द न हो जाये।

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  3. वाह ... क्या लिखा आपने ....
    -----------------
    सिर्फ एक अखबार ही क्यों ?... सबकी वही दशा है ...

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  4. आज की ब्लॉग बुलेटिन गूगल पर बनाइये अपनी डिजिटल वसीयत - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. अखबार तो अब पराठा और अचार लपेटने भर के रह गये हैं
    बहुत सार्थक विचारणीय संस्मरण लिखा है बधाई

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  6. वो कहते हैं न...शब्द अमिट होते हैं ...अमर होते हैं शायद इसीलिए कहते होंगें | अवचेतन मन तो जाने क्या क्या सोचता है , स्वयं बाँधने -साधने का काम हमारा है ...शुभकामनायें

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  7. शाम का जो चित्रण आपने किया वो बहुत ही मनोहारी है
    आँखों के सामने तैरता नजर आया हर दृश्य

    आपने सही कहा
    कि हमारे मन में सभी के लिए चिंताएँ होती है मगर इस दौड़ भरी जिन्दगी में ढेरों चिंताएँ इन चिंताओं को गौण कर देती हैं

    सुन्दर संस्मरण

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  8. आपने सही कहा ख्याल तो अक्सर मेरे दिल में आते जाते रहते हैं |

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  9. बहुत ही सार्थक एवं सारगर्भित आलेख वैसे मैं मोनिका जी की बात से भी पूर्णतः सहमत हूँ।

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  10. आप अपने परिवेश के प्रति बहुत संवेदनशील हैं जो अच्छे रचनाकार के लिये जरूरी है ।

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  11. अवचेतन मन में विचारों का प्रवाह हमें कहाँ कहाँ ले जाता है..बहुत सार्थक और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  12. मन की भावनाओं पर किसका जोर चला है...! इस प्रवाह में अपने को खुला छोड़ देना श्रेयस्कर है। इसमें जो नैसर्गिक आनन्द मिलता है उसे व्यक्त करना बहुत मुश्किल है। आप यह मुश्किल काम कर ले रहे हैं। बधाई।

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  13. ॐ शान्ति .

    शुभ भाव सबके लिए शुभ भावना से प्रेरित बेहतरीन संस्मरण .

    ये दुनिया तो मायावी है ,माया से भला कैसी यारी ,अपने (आत्मा के ),तो दो ही ठिकाने हैं ,वैकुंठ दुनिया निराकारी .....शरीर छोड़ चुकी आत्मा जहां रहे प्रसन्न रहे .गूगल को खाते को निष्क्रिय करने के लिए सलाम .

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  14. ॐ शान्ति .

    शुभ भाव सबके लिए शुभ भावना से प्रेरित बेहतरीन संस्मरण .

    ये दुनिया तो मायावी है ,माया से भला कैसी यारी ,अपने (आत्मा के ),तो दो ही ठिकाने हैं ,वैकुंठ दुनिया निराकारी .....शरीर छोड़ चुकी आत्मा जहां रहे प्रसन्न रहे .गूगल को खाते को निष्क्रिय करने के लिए सलाम .

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  15. ऐसे ख्याल न ही आएं तो ठीक ... सृजन में जब मृत्यु के बाद की सोच आ जाती है तो विचलित होना स्वाभिक होता है ...
    बाकी गौदियाल जी ने जो कहा वो सबसे बड़ा सच है ... हमारी बला से ...

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  16. आपकी भावनाओं को आत्मसात किया..

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