महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, March 30, 2013

भ्रम से मुक्ति की चाह



यूं चल रहे हैं हम बिना शरीर और मन के 
होलिका दहनवाली रात से बुआ का पच्‍चीस वर्षीय लड़का मेरे साथ है। पांच फुट नौ इंच लंबे, अस्‍सी किलो भारी इस नौजवान का शरीर वर्षों के व्‍यायाम से सुगठित है। लेकिन इसका मन-मस्तिष्‍क अस्थिर, भ्रमित और विचलित है। उसने मुझे बताया कि अभिभावक, सम्‍बन्धियों, समाज और विशेषकर सरकार की परिभाषा उसके समझ में नहीं आयी। पिछले तीन दिनों में बच्‍चों की तरह इसने मुझसे ऐसे-ऐसे प्रश्‍न पूछे कि उत्‍तर देते नहीं बने। उसने ऐसी बातें कीं कि मुझे समाज के बारे में एक नई नौजवान विचार-दिशा का पता चला, और ऐसा वाद-विवाद प्रस्‍तुत किया कि यदि छदम् लोकतन्‍त्र के संभालकर्ता इस जैसे नौजवान के सम्‍मुख पड़ जाएं तो हिंसा ही झेलेंगे। उसे अन्‍धी आधुनिकता के भंवर में फंसे अपने जीवन पथ का लक्ष्‍य अंधकारमय दिखाई देता है। उसने उन सब को कोसा जिस-जिस के सम्‍पर्क में वह बचपन से लेकर अब तक आया है। उसने स्‍वीकार किया कि उसकी जिन्‍दगी यदि आज चरित्रपूर्ण और सांस्‍कारिक समाज द्वारा संचालित होती तो वह धनहीन हो कर भी कितनी आत्‍म संतुष्टि प्राप्‍त करता!
उसे स्‍वामी विवेकानंद प्रेरक लगते हैं पर वह उन जैसी जीवन-नींव नहीं मिलने से दुखी है। वह विवेकानंद के आध्‍यात्मिक गुरु रामकृष्‍ण परमहंस के दर्शन का अनुसरण करना चाहता है, परन्‍तु बाल्‍यावस्‍था से ही उस पर थोपी गई सामाजिक चरित्रहीनता और कुसंस्‍कारों की कालिख उसे जीवन-सत्‍य के प्रकाश से डराती है। वह अपनी स्‍मृतियों से चिपकी हुई ऐसी कालिख को चाह कर भी नहीं हटा पा रहा है। वह भला मनुष्‍य बनना चाहता है। पर दैनंदिन के सामाजिक विघटन और तन्‍त्रात्‍मक अकर्मण्‍यता उसे सनकी बनाने पर लगी हुई है। वह परिवेश की विषैली विभषिका से एक विचित्र अन्‍तरद्वन्‍द में फंसा हुआ है।
मैं उसे भोजन के लिए बोलता हूँ तो वह सोच-विचार में मग्‍न मिलता है। वह गम्‍भीरता छोड़ मुस्‍कुराए ये सोच कर मैंने उसे कहा, हां भई चौधरी चरण सिंह क्‍या सोच रहा है, तो कुछ क्षण की चुप्‍पी के बाद वह कहता है, पता है भाई मैं क्‍या सोच रहा हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि जिस सलमान खुर्शीद पर विकलांगों के नाम पर धन हड़पने के पुष्‍ट आरोप लगे उसे सरकार ने पदोन्‍नत क्‍यों कर दिया। उसकी इस बात को सुन मुझसे कुछ बोला न गया। मेरे यह कहने पर कि तू लेख इत्‍यादि लिखा कर उसने कहा कि क्‍या होगा लेख लिख कर। जब सोचे, विचारे, लिखे और पढ़े गए से कोई क्रान्ति, परिवर्तन, बदलाव नहीं हो रहा है तो क्‍या करना यह सब करके। वह कहता रहाभाई अब अखबारवालों को ही देख लो। क्‍या इन्‍हें ये नहीं पता कि समाज के लिए क्‍या सही है और क्‍या गलत। जो अरविंद केजरीवाल पिछले छह दिन से बिना खाए-पिए दिल्ली में अनावश्‍यक बिजली दरों को बढ़ाने के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चला रहा है, उस पर मीडिया का नाममात्र का ध्‍यान है। वह अखबार के पीछे के पन्‍नों में एक छोटी से खबर बना हुआ है। और जिसने अपने घर में हथियारों का जखीरा रखा, आतंकियों से सांठगांठ की, अनेक निर्दोष लोगों को मारने में अप्रत्‍यक्ष रुप से सहभागी रहा, वह (हीरो) बनकर जज, जनता, मीडिया सभी की हमदर्दी बटोर रहा है। कहने का मतलब ये है कि असली हीरो को गलत और नकली हीरो को सही ठहराया जा रहा है। ऐसे में घर, समाजवाले और सरकार हमसे मुद्रा-प्रेमी होने, जिम्‍मेदार बनने की बात करते हैं तो पता नहीं क्‍यूं इन सबसे चिढ़ होने लगती है। जब हमारे पथ-प्रदर्शन के ये सारे ठेकेदार अपना वास्‍तविक दायित्‍व भूलकर हमसे वास्‍तविक उत्‍तरदायित्‍व निभाने की उम्‍मीद करते हैं तो मुझे न जाने क्‍यों विद्रोह की सनक बेचैन करने लगती है। ऐस स्थिति में हमारे पास कौन सा रास्‍ता बचता है सही जीवन जीने के लिए। भाई मुझे तो इन सब झूठी पारिवारिक, सामाजिक और सरकारी परिस्थितियों से निजात पाने की सूझती है। मैंने अल्‍मोड़ा स्थित रामकृष्‍ण मिशन में बात की है। क्‍या मैं वहां जा सकता हूँ…..? 
मैं उसे क्‍या बताता! मैं स्‍वयं भ्रम की उस स्थिति से कहां उबर सका हूँ, जिससे वह पीड़ित है। इस समय उसकी और मेरी मानसिक स्थिति लगभग एकसमान है। अन्‍तर केवल इतना है कि मैंने परिवार, समाज और सरकार द्वारा अधिरोपित भ्रमपूर्ण परिस्थितियों से लड़ना सीख लिया है।



18 comments:

  1. प्रेरणा से भरपूर आज के संदर्भ की सही पड़ताल
    वाकई आज का जीवन संशय भरा है
    सुंदर प्रस्तुति बधाई

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  2. वह भले ही ध्यान देने योग्य न हो, पर प्रश्न तो हैं।

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  3. भाई सवाल तो अनेकों हैं पर आप किस किस से कैसे कैसे जूझ सकते हो | अपनी परिस्थितियों का आंकलन भी आवश्यक है | हर वक़्त आप हाथ में डंडा लिए सुधारवाद के गाने की तर्ज़ पर हर किसी को नहीं हांक सकते | दुनिया में जो हो रहा है और जो होता आया है वो ऐसे ही चलता रहेगा | इस भ्रष्ट तंत्र में बदलाव लाना आसान काम नहीं है | सवाल हमेशा सवाल बनकर ही खड़े रहेंगे इनका जवाब खोजना बेहद मुश्किल है | सार्थक लेख | मैं भी इसी मनोस्तिथि से गुज़र रहा हूँ पर मौन हूँ | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  4. अरविन्द केजरीवाल जी भी कुव्यवस्था के विरोधी हैं इसलिए यह तंत्र उनका विरोधी बना हुआ है.उनकी तरफ मीडिया का ध्यान क्यों नहीं है इसका कारण आज कोई बच्चा भी दे सकता है.
    संजय दत्त की माफ़ी को प्राथमिकता देना और साध्वी जी के इलाज की याचना को नज़रंदाज़ करना [जिनके खिलाफ अभी तक आरोप तय भी नहीं हुए हैं.यह सब क्यों हो रहा है .इनके जवाब जानते हुए भी हम मौन हैं शायद किसी अवतार की प्रतीक्षा में जो इस स्थिति से उबार पाए. भ्रम की स्थिति में लगभग सभी हैं लेकिन रुकना तो नहीं है.

    मन और शरीर के बिना रेत पर चलना ..चित्र लेख का पूरक है.

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  5. हर किसी को अपना रास्ता स्वयं ही चुनना पड़ता है ... आज पूरा माहोल ही भ्रमित है ... ओर इसी स्थिति में स्वार्थी लोग अपना फायदा निकाल सकते हैं ... इसलिए इस स्थिति को बनाते रखना चाहते हैं ...

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  6. सामाजिक और राजनीतिक विद्रूप का खुलासा करती पोस्ट -विकलांगों की बैसाखी खा जाओ क़ानून में सूराख करके और क़ानून से विदेश मंत्री बन जाओ पत्रकारों से कहो मेरे इलाके में आ तब देखूंगा स्साले को ............हाइकमान का गुनगायन करो और प्रवक्ता से सूचना और प्रसारण मंत्री पद पाओ .प्रवक्ता होने का वक्र मुख तभी खोले फिरो .

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  7. आज के जीवन पर सवालिया निशान लगाते सवाल ...
    बेहद पठनीय ....

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  8. बहुत ही प्रेरणाप्रद आलेख आज मिडिया भी उचें रसूख वालों की आगे पीछे घुमती है.

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  9. अंतर्मन में उठते सटीक प्रश्नों की प्रभावी अभिव्यक्ति..मानसिक अंतर्द्वंद से निबटना सच में कितना कठिन होता है..एक विचारणीय आलेख..

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  10. चमकती - दमकती दुनिया में आदमी आभासी ज़िन्दगी जी रहा है...जमीनी सच्चाई आदमी को व्यथित कर देती है...इसलिए जिसे बुद्ध ज्ञान हो गया...वो शायद ही उल्लास में जी पाए...

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  11. पर इस स्थिति से मिला जख्म भ्रामक नहीं होता है.. जब आगे का रास्ता बंद दिखता है .

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  12. जबरजस्त कटाक्ष बुआ के लड़के (चचेरे -ममेरे भाई )की मार्फ़त .बदकार इंतजामिया पर .

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  13. केश भाई हम आभारी हैं आपकी टिप्पणियों के जो हमें प्रासंगिक बनाए रहती हैं .आपका लेखन अलग रंग अलग धार और प्रवाह लिए रहता है आधुनिक जीवन का ,राजनीति के विद्रूप का और विवरण देने में तो सघन अनुभूतियों को शब्द देने में तो आपका कोई ज़वाब ही नहीं है आसपास .

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  14. बहुत ही सुंदर बात कही आपने... आज प्रायः हर संवेदनशील, शिक्षित युवा इन्हीं अंतर्द्वंदों से गुजर रहा है..पर अंतस में उठने वाले इन प्रश्नों के उत्तर कहीं से नहीं मिलते.. विश्व में जिसे आदर्शवाद माना जाता है वो सिर्फ लोगों की बातों तक सिमट कर रह गया है हर कोई उस आदर्शवाद की प्रशंसा तो कर रहा है पर उसका जीवन में अनुसरण होते कहीं नहीं देखा जा रहा...उम्दा प्रस्तुति।।।

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  15. आपकी बुआ के लड़के का सवाल हर उस विवेक शील इंसान के मन का सवाल है, जो सिर्फ अपने तक सीमित न रहकर देश समाज की भी सोचता है। उसका प्रश्न बहुत जायज है और जिसका जबाब वाकई टेडा .

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  16. विकेश,
    ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है न ही तुम्हारा भाई पहला इंसान है। सच पूछो तो आज भारत का हर दूसरा नागरिक इस क्षोभ की स्थिति से गुजर रहा है। मैं जब भी भारत जाती हूँ कुंठित हो जाती हूँ, वहाँ की व्यवस्था की अकर्मण्यता देख कर। शोचनीय स्थिति है, लोग सोचते भी हैं लेकिन सुधार करने की पहल की बात भी अगर कोई करे तो तर्कों के इतने पुलिंदे पकड़ा दिए जाते हैं कि इंसान सोचता है भाड़ में जाने दो सबकुछ ...मेरा क्या
    बहुत अच्छा लिखा है ...

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  17. हालात तो दयनीय हैं ....जाने कितने ही ऐसे प्रश्न अनुत्तरित हैं और रहेंगें

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