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Tuesday, March 26, 2013

रंगों की दृष्टि



मंगलवार की यह दिन-दोपहरी मेरे लिए ही निर्मित है जैसे। धीमे बजता संगीत और आती-जाती चिड़ियों की चहचहाट ही आवाज के रुप में परिवेश में व्‍याप्‍त है। मैं अकेला बैठा हूँ। कुछ पढ़ने की कोशिश की। सोने की इच्‍छा हुई। किसी के घर जाने का मन हुआ। पुराने कागज पत्रों को निकाल कर छांट-सम्‍भाल कर रखने को मचला। फोन उठा कर किसी से बात करने का विचार आया। पर इन सब पर भारी पड़ी यह सम्‍पूर्ण दोपहर और विशिष्‍ट निस्‍तब्‍धता। इन्‍होंने मुझे अपने पर आंखें टिकाए रखने को विवश कर दिया।
दृष्टिहीन बच्चे होली खेलते हुए 
      मेरे कमरे की खिड़की से चार हाथ की दूरी पर एक पच्‍चीस फुट लम्‍बा, सघन और हरा-भरा बेल वृक्ष है। शहर के सीमेंट उद्यान में यह विचित्र है और अपने आप में एक भरपूर प्राकृतिक बागीचा है। इस समय सूरज उसकी शीर्षस्‍थ हरी पत्तियों पर सीधा प्रकाश बिखेरे हुए है। हरी पत्तियां आवाज किए बिना धीमे-धीमे हिल रही हैं। सूर्य की ओर सीधे उन्‍मुख पत्तियां धूप के ताप और प्रकाश प्रभाव से पीली दीखती हैं। पक्षी उड़ते हैं तो उनकी यहां-वहां पड़ती, उड़ती-भागती परछाइयां आंखों से पकड़ने की कोशिश करता हूँ। पर वे पल से भी तीव्र गति से ये दिखीं और वो विलीन हुईंपकड़ में ही नहीं आतीं।
     
बच्चों की निश्छल होली 



       नील-नभ, हरे वृक्ष, पीली धूप, भिन्‍न–भिन्‍न छाया से सजी धरती, रंग-बिरंग भावनाएं और स्‍वर्गमय एकान्‍त मेरे चहुं ओर की इक्‍कीसवीं सदी को सुखद भ्रम बना रहे हैं। पेड़ों का अपने पत्‍तों, शाखाओं, छायाओं के साथ हिलने के वर्णन के लिए मैं सबसे उपयुक्‍त शब्‍द ढूंढता हूँ। लेकिन मुझे देर तक सोचने पर भी कोई शब्‍द न सूझा। पेड़, पौधों, पक्षियों के पंख और पूंछ, घरों की छत पर सूखते कपड़ों को धीरे-धीरे हिला रही मनहर दोपहर की इस हवा को मैं किस तरह इकट्ठा करुं!
  सूरज की तेजी, इसके प्रकाश की पीतमयता को कुछ देर के लिए बादलों ने ढंप लिया है। पर यह धूपहीन और घनमय प्रकृति समय तो प्रखर सूर्य प्रकाश के सौंदर्य से भी अधिक सुन्‍दर है। कल रात को पूर्णमासी का चन्‍द्रमा बेहाल कर रहा था। चांद की रोशनी में पीछेवाले कमरे की खिड़की की सारी लौह-बनावट बिस्‍तर पर परछाई बन फैली हुई थी। अन्‍धेरा कमरा जैसे चन्‍द्रमा के रंग से उज्‍ज्‍वल था। सोने का प्रयास तो किया पर नींद किसे आती ऐसे में। और अब इस समय यह दोपहर बेहा  कर रही है।
बच्चों की मस्ती 
      कल दृष्टिहीन बच्‍चों के होली के रंग खेलते चित्र देखे थे। बरबस वे मेरी आंखों को याद हो रहे हैं। बच्‍चे कितने खुश थे एक-दूसरे पर हरा, लाल, पीला, गुलाबी रंग लगाते हुए। उन्‍हें इसका कुछ आभास नहीं था कि होली खेलते हुए कोई दूर से उनके चित्र खींच रहा है। होली खेलने के लिए उन्‍होंने सोची हुईं मुद्राएं नहीं बनाईं थीं। वे चाहे गए कोण में खड़े हो कर रंग नहीं उड़ा रहे थे। एक-दूसरे पर रंग लगाने की फोटो खिंचवाने के लिए उन्‍होंने विचारी गई भावभूमि नहीं बनाई। उनका प्रेम और सौहार्द प्रदर्शन अत्‍यन्‍त स्‍वाभाविक था। बनावटी होली से सुदूर वे परंपरागत तरीके से होली खेल रहे थे। वे तो साक्षात ईश्‍वरीय अंश बन के होलिका उत्‍सव में तन-मन से डूबे हुए थे। उनका चेहरा दृष्टिहीन हो कर भी कितना रंगानुभव, मानवानुभव लिए हुए था! उनकी हंसी रंगों को देखे बिना ही कितनी रंगीली लग रही थी! उनकी स्‍वाभाविक खुशी और प्रसन्‍नता फाल्‍गुन के सर्वोत्‍कृष्‍ट सरोकार को बरसा रही थी। चित्रकार को मन ही मन धन्‍यवाद दिया कि उसने कितना अच्‍छा काम किया।
      मैं अपनी आंखों से दिखती इस दोपहर, इस प्रकृताभा को उन दृष्टिबाधित बच्‍चों के कानों में शब्‍दों के रंग बना कर डालना चाहता हूँ। मेरे प्‍यारे बच्‍चों तुम्‍हारे प्रसन्‍न, उमंग-तरंग से पूर्ण मुखचित्र देख कर मैं अत्‍यन्‍त द्रवित हूँ। आशा करता हूँ कि तुम्‍हारा मन यूं ही प्रसन्‍न बना रहे। तुम्‍हारी खुशी यूं ही व्‍यक्‍त होती रही हमेशा रंगों के माध्‍यम से।
 (२६ मार्च २०१३, मंगलवार  का संस्मरण)

11 comments:

  1. विकेश भाई आपकी लेखनी और आपके अत्यंत सूक्ष्म निरूपण का कोई सानी नहीं | आप जिस तरीके से प्रकृति और मानव जीवन का चित्रण करते हैं वो अदभुत है | बहुत सुन्दर लेखनी और मैं भी प्रभु से यही कामना करता हूँ के उन बच्चों के जीवन में सदैव रंगों की वर्षा इस प्रकार से बनी रहे फिर चाहे होली हो या न हो पर जीवन के रंग सदा खिले हों | आमीन | शुक्रिया अपनी लेखनी से मुझे अभिभूत और मंत्रमुग्ध करने के लिए | आभार

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  2. गहरी संवेदना के बीच ख़ुशी झलकाती बहुत ही बढ़िया प्रेरक प्रस्तुति ......
    आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!!

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  3. बहुत अद्भुत अहसास और उनका प्रभावी चित्रण..होली की हार्दिक शुभकामनायें!

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  4. आपको और आपके परिवार को
    होली की रंग भरी शुभकामनायें

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  5. रंगों की खूब सूरती देखने वाले की निगाह में होती है और आपकी निगाह से एक रंगीन दोपहर की खूबसूरती नेत्र हीन बालकों के अप्रतिम नासर्गिक ईश्वरीय सौन्दर्य को हम भी निहार रहें हैं .बिखेरते रहिये ऐसे मार्मिक हृदय स्पर्शी शब्द चित्र शब्दों के चितेरे बन .फाग मुबारक .

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  6. बहुत ही प्रभावी चित्रण,होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  7. खूबसूरत सोच और खूबसूरत बयानगी , दोनों एक साथ कैसे परिलक्षित होते हैं इस पोस्ट से जाहिर है.

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  8. प्रभावी आलेख... होली के रंग आपके जीवन को नए हर्ष और उल्लास से भर दें. होली की बहुत-बहुत बधाई और ढेर सारी शुभकामनायें ....

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  9. सच कहा आपने, बच्चों का स्वभाव मन मोह लेता है।

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  10. रंगों को वे दृष्टिबाधित बच्चे विभिन्न स्वरों में ही सुनते देख रहे होंगे ..महसूस कर रहे होंगे ..उनके चेहरे से झलकती खुशी बता रही है.इस खुशी को आप ने देखा ..किसी ने कैमरे में कैद किया ..हम भी सुखद अनुभूति हुई.

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  11. इन बिखरे रंगों को देखने के लिए भी विशेष दृष्टि चाहिए जो कि आपके पास है .तब तो हमें भी देखने को मिला .

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