Wednesday, February 6, 2013

माघ, मूसलाधार, मैं



वर्षा आकर्षण

बाहर आकाश विवर्ण है। कुरुपता ने प्रकृति को वश में किया हुआ है। इतनी सन्‍तुष्टि है कि डीजल एवं पेट्रोल से नि:शेष हो चुकी प्राकृतिक आभा, वृक्ष व इनके पत्‍ते, शहर चमकाने के लिए लगाई गई घास और बाग-बगीचे पिछली रात्रि की निरन्‍तर वर्षा से कुछ समय के लिए सच्‍चा जीवन पा गए हैं। विगत कई दिनों से कष्‍ट में समय व्‍यतीत कर रहा जन-जीवन नए मौसम से संजीवित हो उठा।
     समाचार है कि फरवरी 1942 में ही ऐसी वर्षा हुई थी। शहरी जीवन के लिए ऐसा मूसलाधार नभ-वर्षण कौतुहल और हर्षातिरेक का कारण निसन्‍देह हो, परन्‍तु खाद्यान उपज के लिए यह स्थिति चिन्‍तनीय नहीं होनी चाहिए। कृषि प्रक्रिया को इस असमय असामान्‍य वर्षापात से हानि हो तो मात्र आनन्‍द एवं ह्रदयार्ष के लिए इस पर आकर्षित होना ही मेरे लिए कठिन है। आनन्‍दानुभव के मध्‍य वर्षाजनित हानियों से भी मैं पीड़ित हूं। लेकिन वातावरण की नकारात्‍मकता का प्रभाव उतना व्‍याप्‍त न हो सका, जितना इसकी ऊर्जा से सकारात्‍मक भावविह्वलता में वृद्धि हुई। परिणामस्‍वरुप आज मेरा जीवन प्रकृत-परिवेश स्‍वच्‍छन्‍द-निर्मल वायु से नवप्राण हो गया। यद्यपि बाहर आसमान जलयुक्‍त घनों से भरा होने के कारण कुरुप है, तब भी वर्षा से धुला हुआ सम्‍पूर्ण वातावरण आकर्षित कर रहा है। रात्रि को निद्रालीन होने से पूर्व प्रारम्‍भ हुईं वर्षा जलधारियां सुबह तक गिरती रहीं। अल्‍पसमय के लिए वर्षा रुकती भी तो ऊंचाईवाले स्‍थानों से धरती पर गिरतीं और यहां-वहां टपकतीं जल बूंदें विचित्र ध्‍वनि का ताना-बाना बुने हुईं थीं। वर्षाकाल का आभास देता रात्रि प्रहर संग्रहणीय प्रसन्‍नता का कारण बन गया। मैं विकट विनाशी समय की विद्रूपताओं को अनचाहे ही विस्‍मृत कर गया। न जाने क्‍या हुआ कि मेरे दुखी अनुभव और बोझिल अंत:करण दोनों ने नवरुप ग्रहण कर लिया! अंतर्मन की अशांति को ठहराव मिल गया। मस्तिष्‍कीय झंझावत स्थिर हो शान्‍तरत् बन गए। यह नहीं हुआ कि ऐसी सदानुभूतियों के उपरान्‍त मैं गूढ़ निद्रा में व्‍यस्‍त हो गया। बल्कि मुझे निद्रालीन होने में सुबह तक का समय लगा। लेकिन अनिद्रा से मुझे कष्‍ट नहीं हुआ। यह मुझे अच्‍छी प्रतीत हो रही थी। यह ऐसा जागरण था, जिसमें मैं, मेरा, स्‍व, अपना जैसे पूर्वाग्रह एक बारीक नवानुभव में समाहित हो गए और यहां की मेरी दृष्टि धरती के जीवन को विस्‍मृत कर किसी नए आलोक में पहुंच गई, जहां की जीवन गति और क्षण अनुभूति परम आनन्‍द से पूर्ण थी। लगता ही नहीं था कि मैं दो टांगों और हाथोंवाला इक्‍कीसवीं सदी का मतिभ्रम मानवजीव हूँ। हडिड्यों पर स्थिर एक ऐसा मांसल स्‍वरुप हूँ, जो मशीनी प्राचलों से अपने अहं की उपासना करता है। अपने विकारों का समर्थक मैं आज इस नवोमंगी घड़ी में, मैंनहीं रहा। अपने अस्तित्‍व परिवर्तन की कथा लिखते हुए भी यह जीव, विडम्‍बना के उस दिवाचक्र में उलझ हुआ है, जो रात्रि से लेकर अब तक घूम रहा है। इस प्रकृति अभिनवांजलि से मेरा परमाणु तक गदगद है। ऐसे में लगता है कि घड़ी की सेकेंडमापी सुई की ध्‍वनि और पवन सरसराहट के आभास का मैं चित्रहार बना सकूंगा…….ये विचारधारा मुझे बहाए जा रही थी कि सहसा एक ध्‍वनि गूंजी……साप्‍ताहिक अवकाश है ना आज तो कुछ मेरी सहायता कर लो, कहती हुई श्रीमती जी सामने खड़ी हो गईं। 

5.2.2013,,,,,,,02.34, दोपहर

    

6 comments:

  1. गहन चिंतन बरसात के बहाने, और फिर वही यथार्थ.
    सुन्दर पोस्ट है.

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  2. अलंकृत शब्दों में पिरोयी वर्षा की दास्तान .... अच्छी लगी

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  3. लीजिये, कितना गहरा डूब गये थे।

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  4. अपने स्पैम बोक्स से टिप्पणियाँ निकालिए ...

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  5. वर्षा के साथ भावों के समुद्र में डूब गए..सुन्दर आलेख...

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  6. बहुत खूब . नायाब प्रयास . सुन्दर प्रस्तुति

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