महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, February 20, 2013

मेरी नई दुनिया



चन्‍द्रमा से दूसरे चन्‍द्रमा का हाल पूछता हूँ
 
मध्‍यरात्रि
सुन्‍दर नील गगन
इसके मध्‍य स्थित चन्‍द्रमा
साथ में सितारों का प्रभाव
धरती पर मैं मेरी आंखों के स्‍वप्‍न
शीतल-मंद-मधुर हवा का स्‍पन्‍दन
तुम्‍हारी याद
मैं सांसारिक शरीर से विभक्‍त
हृदय पर हाथ
सांसें लेने में कठिनता
तुम्‍हारी आहों की शीतलता
मेरी आंखों को लगती
मेरे चहुं ओर की धरती
प्रेम करने लगती
मैं जहां तक नभ निहारता
वह तुम्‍हें याद करने लगता
तुम्हें मैं याद हो रहा हूँ
ये मैं अन्‍तर्यामी बन
अनुभव कर रहा हूँ
पवन के झोंके
हमारे भाव अभिव्‍यक्‍त कर रहे
संवेदना की सूचनाएं भेज रहे
चन्‍द्रमयी रोशनी व्‍याप्‍त हर ओर
तरुवर, पवन गति, घर-आंगन
प्रत्‍येक अंत:स्‍थल इससे सराबोर
मैं अपने रहने के स्‍थान को
चन्‍द्रप्रकाश से सुशोभित पाता
अंग-प्रत्‍यंग मेरा
तुम्‍हारी यादों से भर जाता
मेरे जन्‍म से भी पहले मेरी भावनाएं
तुम्‍हारी भावनाओं से
मिल गईं होंगी
मेरे मरने के बाद भी
तुम्‍हारी यादें
मेरी नई दुनिया होंगी
आसमान से
अपने मन की बात करता हूँ
चन्‍द्रमा से दूसरे चन्‍द्रमा का
हाल पूछता हूँ
यहां तारों की श्रृंखलाएं
मेरी सांसें बन व्‍याप्‍त हैं
तुम नभ देखना
तारे वहां तुम्‍हारी याद में
रंगे हैं
चन्‍द्र को अपनी दृष्टि देना
वह धन्‍य हो जाएगा
इस प्राणजीवन के लिए
स्‍वयं की उपस्थिति
नियमित बनाएगा
हवा की सरसराहटें
अपने अहसासों से भर
अपने अनुभवों से महसूस कर
आगे बढ़ाना
मैं उनमें जीवन संगीत सुनूंगा
वह सब देखूंगा
अनुभव करुंगा
जो तुम स्‍वयं के साथ होकर
मेरे लिए सोचती होंगी।


13 comments:

  1. हर शब्द की आपने अपनी 2 पहचान बना दी क्या खूब लिखा है "उम्दा "
    आपने एक अँधेरी रात को अपने शब्दों से उजाला कर दिया
    वहा वहा क्या खूब लिखा है जी आपने सुबान अल्ला
    मेरी नई रचना

    प्रेमविरह

    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

    ReplyDelete
  2. अच्छा लिखा है आपने सुंदर रचना ....

    ReplyDelete
  3. अत्यंत प्रभावी और सुन्दर रचना | आभार |

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    ReplyDelete
  4. बहुत ही उम्दा सुन्दर रचना.

    ReplyDelete
  5. चाँदनी सी मध्यम फैलती आपकी रचना..

    ReplyDelete
  6. बहुत खूब ... स्वयं से परे आलोकिक हो कर प्रेम की मधुर रस धार में गोते लागाती है ये रचना ...

    ReplyDelete
  7. अन्‍तर्मन से निसृत प्रकाश सा..

    ReplyDelete
  8. तुम नभ देखना
    तारे वहां तुम्हारी याद में रंगे हैं
    ------------------------------
    वाह .. छलकता हुआ शब्द ..

    ReplyDelete
  9. एक एक शब्द अंतस को छू जाता...बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  10. समीर जी धन्‍यवाद यहां आने के लिए।

    ReplyDelete
  11. बहुत उम्दा पंक्तियाँ ..... वहा बहुत खूब
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

    ReplyDelete
  12. बहुत सुन्दर लिखा है विकास भाई आपने. अंतर्मन को शीतल कर गयी ये कविता.

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards