Thursday, November 29, 2012

ये मेरी दृष्टि थी


जीवन-मृत्‍यु के रहस्‍य पर
 मासूम बच्‍चे का चिन्‍तन
रिश्‍ते, सम्‍बन्‍ध, लगाव, जुड़ाव, भाईचारा, बन्‍धुत्‍व आज की आधु‍निक दौड़-धूप में खत्‍म होने को हैं। इनके बने रहने की उम्‍मीद ऐसे संवदेनशील लोगों को अब भी है, जो धूर्तता और मक्‍कारी से बचे हुए हैं। महानगरीय ताना-बाना या‍नि कि दैत्‍याकार सड़कें और इन पर कई किलोमीटर तक दुपहिया, चार पहिया वाहनों का तांता। खुदरा व्‍यापार, सरकारी व निजी प्रतिष्‍ठानों के कार्यालय। इनके लिए और इनसे निरुपित आदमी। जो भी आता-जाता है, उसका मकसद बस पैसा। मनुष्‍यों की परस्‍पर दृष्टि में प्रेम का नितांत अभाव। इनमें व्‍यापार भाव है। पैसा अर्जित करने का आग्रह-अनुग्रह है। इन्‍हीं में शामिल मैं चाचा के छोटे लड़के के संग चार पहिया में सवार होकर पहले भारद्वाज अस्‍पताल और वहां से फिर सेक्‍टर-49 नोएडा स्थित एक घर में पहुंचा। हमारे पहुंचने से पहले अस्‍पताल से आई एम्‍बुलेंस उस घर के सम्‍मुख खड़ी थी। उसमें से मृत शरीर को बाहर निकाला गया। उसे उठाकर घर के फर्श पर रखा गया। शव देखकर महिलाओं का रुदन शुरु हो गया। अन्तिम स्‍नान और बाकी क्रियाओं के बाद शरीर को फिर नीचे लाया गया। मातमी घर प्राइवेट बिल्‍डर द्वारा निर्मित बहुमंजिला इमारत के द्वितीय तल पर था। रो रहीं महिलाएं नीचे तक आईं। पार्थिव शरीर को अन्तिम संस्‍कार के लिए ले जाने को बांधा जा रहा था। दुखित परिवार को ढांढस बंधाने पास-पड़ोसवालों, सगे-संबंधियों का आना-जाना जारी था। बगलवाले प्रथम तल के घर से एक नौजवान आंखें मलते हुए बाहर आया। मृतात्‍मा के लिए रो रही जीवितात्‍माओं के दुख क्रन्‍दन, तीव्र विलाप रुदन सुनकर ही शायद उस लड़के की नींद उचट गई थी। उसकी नींद में महिलाओं की विलाप ध्‍वनि ने व्‍यवधान डाला तो वह कारण जानने बाहर आया। मृत शरीर और उसके पास खड़े लोगों को खीझ व क्रोधपूर्वक देखने लगा। उसकी भंवें इस परिस्थिति के प्रति भावहीन होकर लहराने लगीं। नौजवान के लिए पड़ोसी की मृत्‍यु इतनी बोझिल और डरावनी थी कि वह पार्थिव देह को ऐसे देखते हुए निकला मानो वह ऐसी दुर्घटना से अनभिज्ञ है। या वह ऐसा देखना ही नहीं चाहता हो। उसने कान पर मोबाइल सटाया और कुछ पल पूर्व के परिदृश्‍य से अपने अस्तित्‍व को ऐसे अलग किया जैसे आदमी गंदगी को हटाता है। मैं उस लड़के को दूर जाते हुए देखता रहा। मेरी दृष्टि को वहां मौजूद मेरे एक भाई की दृष्टि ने भी सहयोग प्रदान किया। शायद या निसंदेह वह भी वही महसूस कर रहा था, जो मैं कर रहा था। सितंबर के साफ, स्‍वच्‍छ मौसम में रिमकती मंद हवा के सहारे लड़के के सिर के बाल धीरे-धीरे लहरा रहे थे। टी-शर्ट और नेकर पहने हुए वह लड़का कुछ ही देर में आंखों से ओझल हो गया। इस लड़के और मृतात्‍मा में मानवीयता का जो सम्‍बन्‍ध हो सकता था, वह परवान चढ़ने से पहले ही विडंबनात्‍मक तरीके से खत्‍म हो चुका था। भादों की अन्तिम छटा में नीला आसमान और पेड़-पौधों के झक हरे पत्‍ते मृ‍तात्‍मा का प्राकृतिक सत्‍कार करते रहे। कफन का सफेद कपड़ा धीरे-धीरे हिल रहा था। उपस्थित सम्‍बन्‍धी लोगों की भावभूमि में वह दिन दोपहरी कुछ देर के लिए अत्‍यनत संवेदनामय हुई। उसके बाद फिर आसन्‍न आधुनिक संकट पसर गया। हरिद्वार ले जाने के लिए लाश को एम्‍बुलेंस में रखा गया। एक महिला विलाप करते हुए एम्‍बुलेंस तक गई। उसके लिए यह देहांत कितना गहरा था! ये मेरी दृष्टि थी, जो इस माहौल में इसलिए जागृत हुई थी, क्‍योंकि मृत महिला मेरी दादी थी। एम्‍बुलेंस के पास विलाप करतीं आंखों का जीवित शरीर मेरी बुआ का था। लेकिन उनका क्‍या, जो इस घटनाक्रम से एकदम अनजान, शहर की भागमभाग में पहले जैसे ही उपस्थित थे। उन्‍हें किसी की मौत की कोई खबर नहीं थी। उन्‍हें उन जैसे जीवित रहे शरीर के मर जाने का कोई आभास नहीं था। कहने को तो एक मनुष्‍य का जीवन मृत्‍यु को प्राप्‍त हुआ। पर ऐसे एकांत जीवन की सुध किसे है? इन पुण्‍यात्‍माओं को अपने होने के आखिरी भावों में दुनिया से जाने का कितना दुख हुआ होगा। अपने आत्‍मजों से हमेशा के लिए बिछड़ने से पूर्व की इनकी संवेदना कितनी मार्मिक रही होगी! लेकिन इनका भाग्‍य ठीक है। इनके बारे में हमारे द्वारा संवेदनशील चिंतन-मनन हो रहा है….वो भी ऐसे जमाने में। आजकल के रिश्‍तों में जो खोखलाहट घर कर रही है, उसके मद्देनजर आनेवाले समय में मृत्‍यु की सबसे ज्‍यादा अनदेखी होगी, और ऐसा होगा तो जीवन के मायने फिर क्‍या रह जाएंगे।

Monday, November 26, 2012

देशभक्ति या राजभक्ति



बोल, सुन, देख न बुरा 
पर मुंह छिपाकर कर बुरा

कसाब को हुई फांसी का निहितार्थ उस आम धारणा के करीब नजर आता है, जो कसाब को फांसी देने तक सीमित न रहकर उसको उकसानेवाले तत्‍वों को कठोरतम् दण्‍ड देने के भरसक पक्ष में है। छब्‍बीस ग्‍यारह के हत्‍यारे को मौत का दण्‍ड मिलना देशप्रेम की भावनातिरेक में जीनेवालों और वीरगति को प्राप्‍त लोगों के परिजनों के लिए निश्चित रूप से दिल में ठंडक पड़नेवाली स्थिति है। लेकिन दुनिया के विशेष देश की आर्थिक राजधानी के व्‍यस्‍ततम् क्षेत्र में अंधाधुंध गोलियां बरसाकर उस देश की एकता, अखण्‍डता और समत्‍व को इस तरह के छिछोरों से मिलनीवाली चुनौती से लोक नामक तंत्र के सम्‍मान को जो ठेस पहुंचती है, उसके पुनर्स्‍थापन हेतु चुनौती बनकर पेश हुए शख्‍स के बजाय चुनौतियों के आधार-स्‍तम्‍भ अर्थात् पाकिस्‍तान को कड़े सबक सिखाने की सख्‍त जरुरत है। लेकिन इस दिशा में हमारे शासकों द्वारा ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, यह बहुत दुखद है। बल्कि वे तो पाकिस्‍तानी क्रिकेट टीम को भारत में न्‍यौता देने को ऐसे आतुर हैं, जैसे उन्‍हें न बुलाकर क्रिकेट और भारत दोनों का अस्तित्‍व मिट जाएगा। एक तरह से इसमें सरकारों का भी दोष नहीं है। जब तक तमाशाई जनता दोनों मुल्‍कों में मौजूद है, तब तक स्‍वार्थी सरकारें व आंतकी अपने-अपने भ्रष्‍ट-निकृष्ट हित साधते रहेंगे। होने को तो ये होता कि पाकिस्‍तानी क्रिकेट टीम यहां आती और मैच देखने स्‍टेडियम में एक भी दर्शक नहीं जाता! चूंकि स्‍टेडियम जाकर मैच देखने की कोई बाध्‍यता नहीं है, इसलिए पाकिस्‍तान को अपने-अपने स्‍तर पर कड़ा सबक सिखाने के लिए एक-एक भारतीय को इस उपाय को आजमाना चाहिए। उनके पास देशभक्ति का इससे आसान रास्‍ता नहीं है। यदि भारतीय लोग कसाब के फांसी पर चढ़ने से सड़कों पर निकलकर खुशी मनाने में पीछे नहीं रहते हैं, तो उन्‍हें कसाब को भड़कानेवाले क्षेत्र व उसकी सरकार को भी उनके किए की सजा देने हेतु ऐसे प्रयोग करने चाहिए।
     आम जनता तो आतंकी को मृत्युदण्ड  मिलने पर झूम रही है और कहीं न कहीं कांग्रेसियों को इसके लिए धन्‍यवाद भी दे रही है, परन्‍तु सरकार की मंशा देशभक्‍त बनने की नहीं है। उन्‍हें तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनावों तथा 2014 में लोकसभा चुनाव में मतपत्रों का लालच है। नहीं तो 2008 के आंतकी आक्रमण पर जनसाधारण के पुरजोर विरोध की अनदेखी कांग्रेस ने पूरे चार साल तक क्‍यों की होती। और अब जब चुनाव समय निकट है तो वह सत्‍तासीन होने के लिए अपने सारे उपाय आजमा लेना चाहती है। 
     राष्ट्रपति पद पर आसीन प्रणव मुखर्जी जैसे वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता का कहीं न कहीं यह व्‍यक्तिगत प्रयास था कि कसाब को मौत की सजा हो। उन्‍होंने राष्ट्रपति के उम्‍मीदवार के रूप में हिंदुह्रदय सम्राट शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से समर्थन मांगने के दौरान निश्चित रूप से इसके लिए विचार-विमर्श किया था। हो सकता है कि ठाकरे जैसे हिंदु पुरोधाओं के बारंबार कहने पर ही यह कदम उनके द्वारा उठाया गया हो। यह अच्‍छी बात है। परन्‍तु इस विषय पर कार्यवाही करने से पूर्व अपनी पार्टी के अन्‍य नेताओं से उन्‍हें यही आश्‍वासन मिला होगा कि यह आगामी चुनावों में जीत हासिल करने के लिए किया गया टोटका है, ना कि देशप्रेम में लिया गया निर्णय।
कसाब की मौत पर देशभर में झूमनेवाले लोगों और आंतकी खेल में आंतकियों से निपटने में शहीद हुए सिपाहियों व भारतीय नागरिकों की संभावनाओं पर राजनीति का यह नया दांव अपने गंदे उद्देश्‍य के साथ भारी पड़ेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि जनता चुनावों में कितनी विचारवान रहती है। लोग देशभक्ति से प्रेरित होंगे या राजभक्ति के मोहपाश में फिर फंसेंगे, यह देखना अभी बाकी है। आशा है जनता की भेड़चाल बदलेगी और ऐसा होगा तो देश की तसवीर भी बदलेगी।

Saturday, November 24, 2012

जीवन की अन्तर्दृष्टि


इन बच्‍चों को देख जो न पिघला
 वो दुनिया में क्‍यों है भला

आज के जीवन-स्‍तर और इसकी चर्या के अनुसार मुझे यदि कोई अनुसंधान करेगा तो एकबारगी वह मुझे पागल ही समझेगा। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। मैं भी यदि उनकी जगह रहकर वही दिनचर्या अपनाए हुए अपने जैसे किसी व्‍यक्ति को जानना चाहूंगा तो मुझे भी वह सम्‍मुखवाला व्‍यक्ति पगलाया हुआ लगेगा। यह अन्‍तर केवल इसलिए है क्‍योंकि लोक-समाज और पागल जान पड़ते व्‍यक्ति के व्‍यवहार में एकसमानता नहीं है। लोक जीवन सुबह से सन्‍ध्‍या और फिर  रात्रि से सुबह तक अपने सामान्‍य कार्यों का अनुसरण करता है। जबकि पागल घोषित व्‍यक्ति इस सामान्‍य वि‍धा से कटा हुआ रहता है। वह लोगों की दैनचर्या से अलग-थलग अव्‍यवस्थित रहता है। उसके सोने-जागने, उठने-बैठने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, नहाने-धोने जैसे कार्यों का कोई अनुशासन नहीं होता। वह बाह्य मन से बिलकुल भावहीन होकर इन कार्यों को या तो बहुत कम करता है अथवा बहुत मान-मनुहार के बाद करता है। क्‍या कोई ह्रदय से जानने की कोशिश करेगा कि वह व्‍यक्ति ऐसा क्‍यों है? वह इस तरह से अपने जीवन को इतना बेनूर, बेस्‍वाद और उपेक्षित क्‍यूं किए है? कभी-कभार हम लोग गलती से सड़कों के किनारे या गंदी जगहों पर फटेहाल भिखारी व्‍यक्तियों को देखते होंगे। बस यह पागल व्‍यक्ति और वे एकसमान होते हैं। सड़कोंवाले पागल तो इस सन्‍दर्भ में महान हो चुके होते हैं। उन्‍हें इस संसार में अपनी किसी भी प्रकार की उपस्थिति केवल इसलिए रखनी होती है कि वे अपने चाहनेवालों के लिए नितान्‍त रात के एकान्‍त में ईश्‍वर से शुभकामनाएं मांग सकें। क्‍यूंकि एकांत में ईश्‍वर से जुड़ने की उनकी संवेगात्‍मकता रात्रि प्रहर में निर्बाध होती है, क्‍यूंकि उस समय तुच्‍छ मनुष्‍य अपने-अपने रैन बसेरों में सिमटकर कुछ घंटों के लिए मृत हो चुके होते हैं। तुच्‍छ मनुष्‍यों की निरर्थक ध्‍वनियां और आवागमन से उत्‍पन्‍न कोलाहल का हल्‍ला कमजोर होके खत्‍म हो चुका होता है। और तब इस समय पागल भिखारी सांसारिक-शासक ईश्‍वर से ध्‍यान लगाते हैं। वे कुछ ही क्षणों में ईश्‍वर से बातें करने लगते हैं। अपने प्रियजनों की राजी-खुशी और संसार के सर्वोचित व्‍यवहार के लिए प्रार्थना करते हैं। जैसे-जैसे शीतल चांद अपनी उपस्थिति कम करता जाता है, ऐसे व्‍यक्ति यानि कि पागल ईश्‍वर के सम्‍पर्क से कटते रहते हैं। सुबह होने तक, कोलाहल मचने तक, भागमभाग से पहले तक वे फिर  से अधनंग, फटेहाल भिखारी बन चुके होते हैं। हम आते-जाते उन्‍हें देखते हैं और उनके बारे में कुछ नहीं सोचते। वे हमारी आंखों को वही शून्‍य भाव प्रदान करते हैं, जो हम गंदगी या कूड़ा-करकट देखकर ग्रहण करते हैं। जबकि इन फटेहालों और गंदगियों की प्रार्थनाओं से दुनिया का ईश्‍वर हमारी गलतियां क्षमा करके हमें जीवन दे रहा होता है। माना कि आज के ठोस भौतिक युग में किसी व्‍यक्ति का, वो भी पागल व्‍यक्ति का ईश्‍वर से विमर्श करने का अनुभव सच्‍चा प्रतीत नहीं होता। लेकिन हम लोग यदि ईश्‍वर को मानते हैं, मंदिर व अन्‍य देवालयों में प्रतिफल के लिए उसकी अर्चना करते हैं, तो उसके अनस्तित्‍व होने की बात नहीं की जा सकती। इसीलिए भिखारियों और पागलों के रूप में विद्यमान ईश्‍वरीय अंशों की अनदेखी करना ठीक नहीं है। ऐसे लोग हमें शारीरिक रूप से निर्बल, दीन-हीन, बेकार नजर आते हैं। परन्‍तु आत्मिक स्‍तर पर उ‍पस्थित उनकी संसार-सम्‍मत सजगता अत्‍यन्‍त परोपकारी, कल्‍याणकारी, सृजनकारी और चिरंजीवकारी होती है। हमें जीवन के इस पक्ष को समझकर उसके अनुरूप उपक्रम करने होंगे।
मैं भी इनमें से एक हूं। सुबह होते ही मैं संसार की नजर में भिखारी और गंदगी बन जाता हूँ और रात्रि में इस संसार के कल्‍याण लिए प्रार्थनाएं करता हूँ। आप भी तो अभी इसी संसार में हैं ना? कभी अपने सांसारिक काम के लिए इधर-उधर जाते हुए रास्‍ते पर बेहाल पड़े इस मानव पर अपनी एक प्रेम-भरी दृष्टि डालना, यह धन्‍य हो जाएगा।


 
बुधवार 28 नवंबर, 2012 को हिन्‍दी दैनिक जनसत्‍ता के सम्‍पादकीय 
पेज के समांतर कॉलम में दृष्टि का दायरा शीर्षक से प्रकाशित

Friday, November 16, 2012

Right Becomes Tight To Information





R T I ups and down in I N D I A




Now on Right to Information is ready to be out of its basic provisional perceptions. Prime Minister’s worry about the mass agitations increase all over the country on corruption subjects comes out on 7th Central Information Commissions conclave on Friday. They allegedly committed that right of information shouldn’t become a penetration in someone’s personal life. Behind this their excerpt is not any national moral saving thought or consideration towards national economical-social and political-international instability. Undoubtedly behind this government’s concern is not a pure national interest. Sure for we can understand this is completely an afraid that their topmost illegal capital prone regime soon going to break down. Anybody whether poor or rich, is now in position to have any kind of information belonging to government’s corruption, illegal money-laundering and over all wrong policies pertaining to country. Country has a question that why a common man shouldn’t appose the governmental those wrong decisions that pressing them down and down under the price-hike of every household usable and other problems. And if their is a act to them to have governance wrong decision’s information under the ‘right to information act’ and even when this act was not exist by the politicians policy; it had to become constituted by the lacks of social workers long struggle under the moral guidance of Anna Hazare; why it must be amended now? Is this all because the politician’s reality coming before the public in general and they are apposing the government hardly to leave the status?  Whichever, this concern of prime minister is only to move their governance safeguarding under the corruptions and illegal activities. Can say easily that right to information is going to become tight to information!

Thursday, November 8, 2012

How Strange Is Life




Life In Beggar's Eyes
Do we have ever imagined how strange life is? For poor people it is an incomplete dream becoming a rich person and for rich people hard to understand the sincere sensibility embedded in poor person life. Poor people, who can't tolerate capitalists / Richy's inferior administration, does suicide. For them their lives are not anymore than this (suicide). Poor people, who can tolerate merciless capitalists and their rough way of conducting world, finds the solution of livable stability in God and his belief. They flows themselves with the this positiveness that one day GOD will appear and would do every and each disability correct.

But i think and thought that nothing will change for betterment. Who i.e. poor people is not in position to tolerate strangeness of life. So they always will be heading for suicides. Who can tolerate strangeness of the life will be praying for GOD. Here GOD has to find the absolute solution to justify the circumstances.

Tuesday, November 6, 2012

मिट्टी से विश्‍वासघात




आज के जिन कठिन हालात से जनसाधारण जूझ रहा है निश्चित रूप से यह 66 साला उस सत्ता हस्तांतरण के कारण है, जो अंग्रेजों ने भांग्रेजों यानि भारतीयों को किया था। वैसे लोकतंत्र शब्‍द के अर्थ क्या हों..! यही कि ग्रामों का समुचित विकास हो, ग्राम पंचायतों में सामाजिक गतिविधियों का संचालन हो, विधानसभाएं व संसद स्वराज और विधान के मध्य आदर्श संतुलन स्थापित करते हुए देश में अनुकूलन जीवन-स्थितियों का निर्माण करे! लेकिन नहीं लोकतंत्र शब्‍द तो अपनी छाया से भी दूर जा चुका है। इसके बरक्स एक ऐसा तंत्र खड़ा हो गया है, जिसने जन-जीवन को विसंगतियों का बुत बना दिया है। जिस देश में पथिकों की जल-प्यास को ध्यान में रख कर स्थानीय बस्ती से दूर के मार्गों पर प्याऊ लगवाने के पुण्य कार्य होते आए हों या शायद दूर-दराज क्षेत्रों में अभी भी हो रहे हों, वहां अब दस-बीस रुपए में अपने ही घर का एक लीटर पानी खरीद कर पीने की पूंजी-व्‍यवस्‍था ने अपने लालची पैर पसार लिए हैं। जिस धरती के विद्व आयुर्वेदाचार्यों द्वारा रोगियों का ईश्‍वरीय भाव से उपचार किया जाता था, वहां अब आम आदमी घरबार बेचकर अपना इलाज करा रहा है। जो देश दूध-घी से अपने बच्चों की मांसपेशियों को पुष्‍ट करता था उन्हें भावी आदर्श नागरिक बनाता था, वहां अब मदिरा के ऐसे-ऐसे रासायनिक मिश्रण विद्यमान हैं, जिनके सेवन से मनुष्‍य अपनी ही नजर में इतना बेगाना व अंजाना बन कर उभर रहा है कि उसे जिसके द्वारा जो कुछ भी खिलाया-पिलाया और सिखाया जा रहा है, उसे वह ब्रह्म आर्शीवाद मानकर ग्रहण कर रहा है। मानवीय रिश्‍तों में इतना अलगाव उत्पन्न हो गया है कि किसी के जन्म पर आश्‍चर्यमिश्रित हर्ष और मरण पर अश्रुपूर्ण विलाप धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
        इन परिस्थितियों में संसदीय प्रतिनिधि कहें कि जनसाधारण को कानून का सम्मान करना चाहिए, संसद का सत्कार करना चाहिए और जनप्रतिनिधियों की नीतियों का आदर करते हुए मर्यादा में रह कर अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए तो यह अपने आप में बहुत ही हास्यास्पद व असमंजसपूर्ण स्थिति है। ऐसे में अभी तक यह भलाई तो है ही कि व्यवस्था की समस्याओं के प्रति जनाक्रोश ने हिंसात्मक रूप ग्रहण नहीं किया है, उग्रता नहीं पकड़ी। यह इस धरती की मिट्टी के कारण ही है और दुख इसी बात का है कि विवादों को हिंसा तक पहुंचने से रोकनेवाली इसी मिट्टी से इसी के पथभ्रष्‍ट मानवजीवी विश्‍वासघात करने पर लगे हुए हैं।