महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, December 15, 2012

जीवन और आत्‍महत्‍या





जीवन...
पिछली रात को इतना दुखी था कि सब कुछ बेकार लग रहा था। अपने को अंधेरे और चाहरदीवारी में ही बन्‍द रखने की इच्‍छा होती थी। इसलिए दोपहर एक बजे सोकर उठा। लेकिन अब मैं खुश हूं। क्‍योंकि दोपहर का आज का मौसम बहुत सुन्‍दर प्रतीत हो रहा है। गर्मी का अनुभव तो हो रहा है, पर साथ-साथ वर्तमान मौसम मुझे मन से पिघलाने में लगा हुआ है।
एक अहसास हो रहा है, जिसमें दुख के बगैर किसी की याद खुशियों से सराबोर होती जा रही है। क्‍योंकि प्राकृतिक स्थिति अत्‍यंत मनमोहक है। धूप अपने सम्‍पूर्णत्‍व पर है। पेड़ों का हवा के सहारे हिलना और ठंडी हवा देना कितना अच्‍छा लग रहा है। आसमान में कहीं-कहीं मेघों का आवरण बना हुआ है। तितलियां अपने रंग-बिरंगे रुप के साथ तेजी से स्‍थान-परिवर्तन कर रही हैं। पीपल के नए खिले हुए पत्‍तों का यौवन अलग से आकर्षित करता है। चिड़ियों और अन्‍य पक्षियों का आवागमन प्रसन्‍नता एवं उदासी का कारण बनता है। लगता है कि इन जीवों का भाग्‍य और शक्ति कितनी उपयोगी है, कि ये जहां चाहे आ-जा सकते हैं। विशेषकर इनका आना-जाना किसी किस्‍म की पाबंदी और रोक के दायरे में नहीं है। मुझे भी यह वातावरण हर ओर से और हर स्‍तर पर निश्‍छल, निष्‍कपट बना रहा है। लगता है जैसे मेरा अब किसी से भी कोई वैर नहीं रहा। जैसे मेरी द्वेत भावना का ह्रास हो गया है। मेरे मतभेदों को भी ये प्राकृतिक दशा नष्‍ट करती लगती है। जिस प्रकार प्रकृति ने अपना भोला रुप ग्रहण किया हुआ है,  मैं भी वैसा ही भोलानाथ बन रहा हूं। सचमुच मेरा नव ह्रदयोदय हो रहा है। कलुष और अहम भाव का विनाश हो रहा है। यदि ऐसे में कोई मुझे बहुत ज्‍यादा नफरत करता है, तो मैं  दोपहर के  इस  वैभवशाली वातावरण में गहराई तक समा जाना चाहता हूं। ताकि कोई मुझे ईर्ष्‍या करे तो तब भी मैं भालेनाथ का ही अनुरागी बना रहूं और कई बार एवं कई मौकों पर जीवन को कष्‍ट समझनेवाले अपने भावों पर, आज के इस स्‍वर्गमय वातावरण की खुशियों के विचारों से, जीवन की सच्‍ची बातों का लेप लगा सकूं। वे सच्‍ची बातें, जो प्रकृति के इस अनोखे रुप के कारण स्‍वभावत: निकल रही हैं। आत्‍महत्‍या करनेवाले यदि कभी इस अवस्‍था से परिचित हुए होते और स्‍वयं को आत्‍महत्‍या के लिए उकसानेवाले इसका अनुभव करतेतो कितना अच्‍छा होता। वे लोग मृत्‍यु का कोपभाजन बनने के बजाय जीवन का आनंद उठा रहे होते। जो लोग तंगदिल रहते हैं, वे ऐसे पलों (दोपहर के) को अपने जीवन में समेटें। तब देखें उनकी स्‍वयं की प्रकृति कैसे इस दोपहरी प्राकृतिक व्‍यवस्‍था में बदल कर शांत हो जाएगी। इसके बाद वे नई जीवन अनुभूतियों से सुसज्जित हो जाएंगे। इनका असर उनको महादयावान बना देगा। वे महसूस करेंगे कि वास्‍तविक जीवन में उनका पदार्पण तो अब हुआ है। पहले तो वे मशीनी सोच के अनुरुप चल रहे थे। 
क्‍या परोपकारी छटा है प्रकृति की। मुझे दुख है कि क्‍यों बचपन से मैं इन दोपहरों से नियम से नहीं मिला। क्‍यों इतनी सुभाषित प्रकृतिप्रदत्‍त अवस्‍थाओं को मैं ह्रदयांगम नहीं कर सका। आज तक मैं वैमनस्‍य और जलन से कितना छुटकारा प्राप्‍त कर चुका होता! कौन नहीं होता जो मेरे स्‍वभाव से तब पिघला न रहता! कितने लोगों के बीच जाकर अब तक मैं उनको भी अपने जैसा बनने के लिए प्रेरित कर चुका होता! मेरे जीवन परिवेश की कितनी सामाजिक कुरीतियां और विसंगतियां समाप्‍त हो चुकी होतीं! लोगों के दयावान बन कर रहने से कितने दुख और कष्‍ट अब तक मिट गए होते! सर्वोपरि शक्ति से प्रार्थना करुंगा कि वो ऐसी दोपहर निरन्‍तर बनाए, जो मुझे निराशा से आशा में परिवर्तित कर दे। 
 ...और आत्‍महत्‍या
परन्‍तु ऐसा नहीं होगा। आज कोई भी रुक कर आराम से सोचना नहीं चाहता कि उसे जीवन क्‍यों प्राप्‍त हुआ? इसका उद्देश्‍य क्‍या है? सामाजिक विघटन बहुत पहले से शुरु हो चुका है। हमारा समय इसकी चरमोत्‍पत्ति देख रहा है। सर्वप्रथम धर्म बिखरे फिर समाज उखड़ा, संयुक्‍त परिवार टूटे और अब एकल परिवार के मात्र दो या तीन सदस्‍यों के दिलों में खटास बढ़ रही है। सबका कारण एक ही है, अंधी आधुनिकता। परिणामस्‍वरुप आत्‍महत्‍याओं की प्रवृत्ति पैर पसार रही है। देश-दुनिया के कर्ताधर्ताओं को अपने उस किए पर तो पछताना ही होगा, जिसकी शायद समाज को कभी जरुरत ही नहीं रही। हाल ही में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दु कॉलेज के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट शोधार्थी, लंदन स्थित अस्‍पताल में भारतीय मूल की नर्स और गाजियाबाद के किशनपाल ने अपनी-अपनी जीवन लीलाएं जिन परिस्थितियों में समाप्‍त की हैं, उनका निर्माण कोरी और खोखली आधुनिकता के पैरोकारों ने ही किया है।  

7 comments:

  1. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
    http://madan-saxena.blogspot.in/
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  2. श्रीमान.....धन्‍यवाद।

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  3. बढ़िया लिखा आपने ..

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  4. आपने बहुत सही लिखा है |बढ़िया लेख |
    आशा

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  5. बहुत सच कहा है..क्या होगा भविष्य अगली पीढ़ी का..क्या वे यह समझने को तैयार हैं? अपनी जड़ों से कटी सभ्यता कब तक साथ दे पायेगी?

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  6. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

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  7. मुझे भी आत्महत्या करने का विचार आता है .....कई बार करना चाहती हूँ ..किसी ऊँची बिल्डिंग से कूद जायुं .
    पर शायद बहुत कायर हूँ .. बच गयी तो जीवन नर्क हो जायेगा ... तो यही बेहतर है ..... कीड़े सी ज़िन्दगी बिताना .....

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