महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Tuesday, December 18, 2012

23 अप्रैल, 2004 का संस्‍मरण





आज दोपहर को मुरादाबाद से वापस अपनी काल-कोठरी में पहुंचा। पिछली शाम और रात की बारिश ने मौसम को बहुत अधिक आकर्षित बना दिया था। विवाह समारोह में मैंने जितना उत्‍साह और आनंद दिखाया वह सबके लिए लाभकारी रहा। इस समारोह में काश ऐसा भी कोई होता जो मेरे अत:स्‍थल को देख पाता, जहां इस विशेष दिन के अलावा शेष समय एक भयंकर बिखराव है। क्‍या पता! सभी या आधे से अधिक लोगों के साथ यही स्थिति हो! इसलिए मैं सभी के लिए मन से प्रार्थना करता हूं कि वे ऐसे आयोजनों में उपस्थित होकर अपनी दिनचर्या में एक आनंदातिरेक अवश्‍य उत्‍पन्‍न करें।
इस अवसर पर मदहोश करनेवाली कोई बात अगर हुई तो वह यह थी कि मौमस ने गर्मी को दो एक दिन के लिए किनारे करके अच्‍छा रोमांच पैदा कर दिया। सभी लोग प्रफुल्लित हो गए। डांस जंक्‍शन में सभी ने खुल कर नृत्‍य किया। मैं भी सब भूल कर नाचने लगा।
मेरी सहजता को कुछ लोग गलत प्रकार से आंकते हैं। तभी तो विवाह-समारोह में उपस्थित एक महिला मेरी बातों को संदेहास्‍पद और विनोदपूर्ण तरीके से ले रही थी। जबकि मैं उससे बिना किसी स्‍वार्थ के बातें कर रहा था। मैंने जिन्‍दगी में हमेशा यह महसूस किया है कि जिन लोगों के पीछे मैं भागा वे मुझे उल्‍लू बनाते और मूर्ख समझते, और इन सबसे अलग उन स्थितियों में मैं स्‍वयं को बहुत भद्दा महसूस करता। जबकि जो लोग मुझे पूछते, मेरी ओर आकर्षित होते उन्‍हें मैंने उल्‍लू समझा तथा उनकी किसी बात को कभी भी गम्‍भीरता से नहीं लिया। ऐसे लोगों में कई अत्‍यधिक आकर्षित थे। शायद मुझे मेरे द्वारा सताए गए लोगों के फलस्‍वरुप अपने को सताने का फल ऐसे लोगों से मिल रहा है, जिनके पीछे मैं भाग रहा हूं। जीवन के इस प्रकार चलने से मैं रोज मर रहा हूं। एक स्‍वतन्‍त्र जिन्‍दगी क्‍या है! एक खुला और खुशी से सम्‍पूर्ण जीवन क्‍या है! मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है। हर स्थिति में, हर बात में और हरेक स्‍थार पर मेरा असहज होना और हड़बड़ी में हर कार्य करना मुझे अव्‍यवस्थित करता है। मुझे लगता है मैं अदृश्‍य स्थितियों को आत्‍मसात कर रहा हूं। वास्‍तविकता को नकार रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मैं एक कल्‍पना बन जाऊं! ठंडी हवा के साथ मेरा सम्मिश्रण हो जाए। समझहीन शारीरिक ढांचा ध्‍वस्‍त हो जाए। जीने की आस में टंगी इच्‍छा को कत्‍ल कर दिलेरी दिखाऊं। जान गवाऊं और अमर हो जाऊं। झंझटों के आडम्‍बर से छिटक कर एक शांत किनारा प्राप्‍त करुं। इतना होने के लिए मैं कई बार सोचता हूं। पर कुछ भी घटित नहीं हो पाता। मन फिर एक बार जीने की इच्‍छा से पृथ्‍वी को कल्‍पना में दिव्‍य बनाता। इच्‍छा पुन: उभरती कि प्राकृ‍तिक अवस्‍थाएं तो सच्‍ची हैं। वे तो मनुष्‍य की तरह धोखा नहीं देतीं। तब क्‍यों न उन्‍हीं के सहारे जीवन काटा जाए। लेकिन कहीं न कहीं से मानवता के खंभे जर्जर होकर मेरी भावनाओं के सिर पर गिरते और मैं परेशान, अचेत और बेहोश हो जाता। जिन्‍दगी का हाथ गन्‍दा नजर आने लगता तथा मृत्‍यु की बांहें सुहावनी लगने लगतीं।
     हजारों सालों से न जाने कितने मानवों ने दुनिया को अपनी दृष्टि से टटोला होगा। न जाने कितने विद्वान इसका रहस्‍य खोजने में असफल होकर पथरायी आंखों से अपनी मौत की प्रतीक्षा करते रहे होंगे।  फिर भी कुछ वर्षों तक जीने के लालच में हम जीवन रहस्‍य को सोचने-विचारने के बजाय दैनिक क्रियाकलापों को निपटाने में ही सारा समय व्‍यतीत कर देते हैं।
     मैं अपनी कहानी कहता हूं। मैं अपना अधिक समय एकांत में गुजारता हूं। यह तो मेरी विवशता है कि अपनी दैनिक उपभोग की वस्‍तुओं के लिए मुझे इस अजीब समाज से जुड़ना पड़ रहा है और नौकरी या रोजगार करना पड़ रहा है। यदि मैं पारिवारिक रुप से धनी होता तो अपने जीवन सिद्धांतों के सहारे पागल होकर बैठा रहता। अभी पागल इसलिए नहीं हो पाया हूं क्‍योंकि आधे से अधिक वक्‍त बेतुके समाज को, इसके व्‍यर्थ कार्यों को देना पड़ता है। स्‍वाभाविक रुप से ऐसे में रहस्‍यात्‍मक अभिवृत्ति संकुचित हो जाती है और सामान्‍य प्रक्रियाओं को निपटाने की हाय-तौबा में शामिल होना पड़ता है। तब भी यदा-कदा जब अपने मनोविचारों में गहरे उतरने का मौका मिलता है तो अपनी उपस्थिति भ्रमात्‍मक हो जाती है, और शायद इसी भ्रम अवस्‍था से मैं जीने के लायक बचा हुआ हूं। यदि मैं यहां समाज के आवरण से जीने की कोशिश करता तो मेरा प्रयास कभी भी सफल नहीं होता। ऐसा करते हुए मैं कई बार मर चुका होता।
     मेरा मजबूत पक्ष यह है कि मैं किसी के द्वारा दर्शाई गई चिंता में शामिल नहीं होता। मैं दूसरे को कम ही सुनता हूं। कभी-कभी अपनी इस आदत से मुझे हानि भी होती है क्‍योंकि अपने लिए अच्‍छे सिद्ध होनेवाले लोगों की सच्‍ची बातें और चिंताएं भी मैं अनसुनी कर देता हूं। निश्चित रुप से यहां मैं मूर्ख हो जाता हूं, और यह सब क्‍या पता इसलिए होता हो कि अधिकांश समय मुझे अविश्‍वास और धोखा मिला। तब इसमें मेरी भी कोई गलती नहीं देखी जा सकती।
     जिस भूखण्‍ड में हम रह रहे हैं, वहां क्‍या-क्‍या नहीं हो रहा! क्रूरता विकसित हो रही है। प्‍यार को दीमक चाट रही है। धोखा साहस और बलपूर्वक आगे बढ़ रहा है। दोस्‍ती दुश्‍मनी में परिवर्तित हो रही है। पता नहीं मनुष्‍य को यह विचार है भी या नहीं कि वह हड्डियों पर खड़ा रक्‍त और मांस का अल्‍पायु जोड़ है। उसका दम्‍भ तो इतना तीक्ष्‍ण हो गया है कि वह लोहे को भी चबाने की चुनौती दे रहा है। वह अपने भग्‍गस और घटिया अस्तित्‍व को धरती से विशाल और आसमान से विस्‍तृत मानने लगा है। उसे अपने जानवर बनने की स्थिति बहुत सुखद लगती है। निर्धन मनुष्‍य को अपनी जिन्‍दगी बड़ी कष्‍टकारी प्रतीत हो रही है। अत्‍यधिक भीड़भाड़ में नामी-गिरामी लोग भी भुला दिए गए हैं। क्‍यों तो लोग जिन्‍दगी की गाड़ी धकेल रहे हैं! कौन सी उपलब्धि ऐसी है, जो जिन्‍दगी गुजार कर प्राप्‍त होगी, और जब सभी ने मृत्‍यु का ग्रास बनना है, तो क्‍यों जिन्‍दगी को स्‍वार्थमय किया जा रहा है? क्‍यों प्रकृति को तहस-नहस किया जा रहा है, और क्‍यों सांसारिक संवेदना का गला दबाया जा रहा है ? 

5 comments:

  1. विकेश भाई दिल खुश हो गया पढ़कर | आपको अपने से जुड़ा पाता हूँ हमेशा आप जो भी लिखते हैं | परिस्थितियां मेरी होती हैं और शब्द आपके | कमाल है यार लाजवाब |

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  2. क्या कहूँ कुछ समझ नहीं आरहा है। बहुत कुछ उलझा-2 सा लग रहा है। ज़िंदगी को देखने और जीने का तरीका एवं नज़रिया सभी का अपना-अपना है, मौत तो एक दिन आनी ही है।
    इसलिए मेरा मानना तो यह है कि पूरे समाज को तो हम एक ज़िंदगी के चलते बदल नहीं सकते। हाँ अगर कुछ बदला जा सकता है, तो वह हम खुद को ही बदल सकते हैं।
    ऐसे हालातों में बजाए समाज कि चिंता में घुल-घुल कर मरने से तो अच्छा है, "जियो और जीने दो" के तर्क पर चलते हुए अपनी तरफ से बस यही कोशिश रहे कि गलती से भी कभी किसी का दिल न दुखे,खुद खुश रहें और अपने आस पास के लोगों को भी खुश रखने का प्रयास करने...बस यही एक रास्ता मुझे तो ठीक नज़र आता है बाकी तो पसंद अपनी-अपनी, ख्याल अपना-अपना...

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  3. विकेश जी वर्तमान वास्तविकताओं को बेबाकी से आपने सामने रखा है। हाल-फिलहाल इंसान अपनी अधमता की ओर क्यों कदम उठा रहा है पता नहीं। पर आसान रास्तों को चुन कर संघर्ष और मेहनत को नजरंदाज किया जाता है। आपने इन सारी बातों पर सहज और सुलभ ढंग से प्रकाश डाला है।

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  4. विकेश जी वर्तमान वास्तविकताओं को बेबाकी से आपने सामने रखा है। हाल-फिलहाल इंसान अपनी अधमता की ओर क्यों कदम उठा रहा है पता नहीं। पर आसान रास्तों को चुन कर संघर्ष और मेहनत को नजरंदाज किया जाता है। आपने इन सारी बातों पर सहज और सुलभ ढंग से प्रकाश डाला है।

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  5. निष्पक्ष आत्म मंथन भी हर किसी के बस की बात नहीं होती। अधिकाँश लोगो मुगालते में जीने के ही आदी है,फिर भी आपकी कोशिश सराहनीय है,विकेश जी !

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