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Tuesday, May 22, 2018

कर्नाटक में लोकतंत्र की वास्‍तविक हत्या

दि भाजपा आठ विधानसभा सीटें और जीत गई होती तो आज कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश-दुनिया का ध्‍यान दूसरी समस्‍याओं पर होता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। राज्‍यपाल वाजुभाई वाला ने भाजपा को सरकार बनाने का आमंत्रण पहले दिया। इस को लेकर कांग्रेसियों ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय को आधी रात को खुलवा दिया। मतलब साफ था सर्वोच्‍च न्‍यायालय का बड़ा कार्यकारी हिस्‍सा अब भी कांग्रेसी इशारों पर काम करता है।
विकेश कुमार बडोला 
लेकिन इस सबके बीच भी येदियुरप्‍पा ने आमंत्रण मिलने के बाद मुख्‍यमंत्री के रूप में शप‍थ ग्रहण कर ली। प्रोटेम स्‍पीकर को लेकर भी कांग्रेसी फि‍र सर्वोच्‍च न्‍यायालय पहुंच गए कि स्‍पीकर भाजपा के हित को ध्‍यान में रखकर चुना गया है। कांग्रेस ने अपने नाराज विधायकों को कर्नाटक से दूर किसी रिजॉर्ट में कैद करवा दिया ताकि वे किसी लालच में भाजपा को समर्थन न दे दें।
राज्‍यपाल से सरकार बनाने का आमंत्रण मिलने और बहुमत सिद्ध करने के लिए 15 दिन का समय मिलना भाजपा के लिए लाभदायक था। इसी उत्‍साह में येदियुरप्‍पा ने शपथ भी ली थी। लेकिन कांग्रेसियों के दबाव में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने बहुमत सिद्ध करने के लिए येदियुरप्‍पा को शनिवार शाम 4 बजे तक का ही समय दिया। फलस्‍वरूप भाजपा की राजनीतिक कार्ययोजना बाधित हो गई और येदियुरप्‍पा को मोदी-शाह की सलाह पर इस आशंका के चलते शनिवार को 4 बजे से पहले त्‍यागपत्र देना पड़ा कि भाजपा बहुमत सिद्ध नहीं कर पाएगी।
यह आशंका इसलिए बढ़ी क्‍योंकि कांग्रेस के नजरबंद विधायकों को खुद कांग्रेसियों की तरफ से हत्‍या आदि की धमकियां मिलने लगी थीं। इसके अलावा भाजपा द्वारा नाराज कांग्रेसी विधायकों को जितने धन में खरीदने का मिथ्‍या प्रचार मीडिया में हुआ, उससे ज्‍यादा धन का लालच खुद कांग्रसियों और जदसे ने विधायकों को दे डाला। यदि पन्‍द्रह दिन तक भाजपा को बहुमत सिद्ध करने का समय मिलता तो संभव था नाराज कांग्रेसी विधायकों से कर्नाटक के बड़े जनादेश के हित में अपील कर उन्‍हें समझाया जा सकता था। लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने एक ऐसे मुद्दे पर भ्रष्‍ट कांग्रेसी पार्टी का बचाव किया, जिसे कर्नाटक के हित में न्‍यायालय द्वारा अनदेखा भी किया जा सकता था। लेकिन दुर्भाग्‍य से ऐसा न हो सका।
          अब जदसे के कुमारस्‍वामी कांग्रसी गठबंधन में दोनों दलों के 117 विधायकों के समर्थन से बहुमत सिद्ध करेंगे और मुख्‍यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे। एक आधुनिक, प्रौद्योगिकी से लैस और पढ़े-लिखे लोगों से भरे राज्‍य में भाजपा के पक्ष में गए जनादेश के साथ ऐसा क्रूर मजाक क्‍या कर्नाटकवासियों को स्‍वीकार होगा? निश्चित रूप में 104 विधानसभा क्षेत्रों के वे लोग जिन्‍होंने भाजपा के प्रत्‍याशियों को विशाल मतों के अंतर से जिताया, उनके लिए कर्नाटक में कांग्रेस-जदसे के कुमारस्‍वामी का मुख्‍यमंत्री बनना किसी दु:स्‍वप्‍न के सच होने से कम नहीं। इसके विरोध में कर्नाटक में बड़े जनांदोलन के उभरने की आशंका है, जिसकी मांग पर कर्नाटक विधानसभा के लिए पुनर्मतदान भी हो सकता है। ऐसा होना भी चाहिए। अन्‍यथा देश में बड़े जनादेश का महत्‍व क्‍या रह जाएगा।
जो लोग गोवा, मिजोरम जैसे छोटे राज्‍यों में भाजपा द्वारा कांग्रेस से कम सीटें लाने के बाद भी भाजपा सरकार बनाए जाने की स्थितियों से कर्नाटक राज्‍य की तुलना कर रहे हैं, वे यह क्‍यों नहीं सोचते कि इन राज्‍यों में कांग्रेस के अलावा अन्‍य दलों के और निर्दलीय विजयी विधायक थे वे चुनाव पूर्व ही भाजपा के साथ सरकार बनाने की इच्‍छा से भरे थे। बेशक भाजपा ने इन दलों से चुनाव पूर्व कोई आधिकारिक गठबंधन नहीं किया था, पर अपने-अपने विजयी विधानसभा क्षेत्रों की जनता की मांग पर ये दल किसी तरह भाजपा को समर्थन देकर उसकी सरकार बनवाना चाहते थे। जबकि कर्नाटक में जदसे ने कांग्रेस के संबंध में ऐसा कोई विचार नहीं किया था। यह तो केवल कांग्रेसी षड्यंत्र था, जो वह किसी तरह भाजपा को सत्‍तारूढ़ होते नहीं देखना चाहती थी। इसीलिए उसने अपने धुर विरोधी जदसे को बिना शर्त, बगैर मांग, यहां तक कि जदसे को धन देकर, उसे समर्थन लेने को उकसाया और मुख्‍यमंत्री के लिए भी उसी के कुमारस्‍वामी को नामांकित कर दिया। ऐसे में भला जदसे को क्‍या चाहिए था। जो पार्टी तीसरे नंबर की पार्टी हो और जिसे दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस से मुख्‍यमंत्री पद और विशाल धनराशि के एवज में सरकार बनाने का मौका मिल रहा हो, वह ऐसा मौका क्‍यों चूकेगी। उसके लिए तो राजनीतक समझदारी यही होगी कि कांग्रेस का समर्थन ले ले, समर्थन लेने के लिए पैसा ले ले, सरकार बनाए और अपने विधायक कुमारस्‍वामी को मुख्‍यमंत्री बनता देखे। लेकिन वास्‍तव में ऐसा होने से कांग्रेस और जदसे के नाराज विधायकों के भीतर अपने-अपने दलों के प्रति विद्रोह भी कालांतर में अवश्‍य पनपेगा, जिसकी परिणति जोड़-तोड़ की सरकार की अस्थिरता के रूप में बार-बार सामने आएगी। 
कर्नाटक के संबंध में गजब स्थिति तो यह है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कांग्रेस-जदसे के इस बेमेल और अवसरवादी गठबंधन के विरोध में कोई कानूनी व्‍याख्‍यान नहीं दिया। जो लोकतंत्र, संविधान देश में है और जिन लोगों की ओर से यह स्‍थापित है, उनमें से अधिसंख्‍य लोग तो कांग्रेस-जदसे के कर्नाटक में बने राजनीतिक गठबंधन को अस्‍वीकार्य  और राजनीतिक रूप में अवैध मानते हैं। तब सर्वोच्‍च न्‍यायालय कौन से और कहां के अधिकारों से यह निर्णय ले रहा है कि वह बड़े दल को राज्‍यपाल द्वारा बहुमत के लिए 15 दिनों का समय दिए जाने की अवधि घटाकर एक दिन कर दे या वह कर्नाटक ही नहीं देश की अधिसंख्‍य जनता की इस इच्‍छा की पूर्ति में बाधा बन जाए कि कर्नाटक में भाजपा की सरकार बने।
सर्वोच्‍च न्‍यायालय यदि इस मामले में संविधान, कानून और राज्‍य विधान के नियमों से बंधकर भाजपा की सरकार बनाने के पक्ष में निर्णय नहीं दे सकता था, तो बात समझ आती है। लेकिन वह एक काम तो कर ही सकता था कि कांग्रेसियों की सत्‍ता पाने की बेचैनी को भांपकर रात को सुनवाई के लिए राजी ही नहीं होता। आखिर इतनी क्‍या विवशता थी सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों की। कौन सा पहाड़ टूटा था, कौन सी आपदा देश में आ गई या पूरे देश का जन-जीवन खतरे में था जो उसने कांग्रेसियों के लिए आधी रात के बाद न्‍यायालय को खोला, रातभर सुनवाई की और सुबह तक सुनवाई होती रही। 
देश में बंगाल के पंचायती चुनाव में लोकतंत्र का दम घुट चुका है, कश्‍मीर में भारतीय गणराज्‍य की धारणा को एक दिन में कई बार चुनौती मिल रही है, केरल में मु‍सलिम विसंगतियों के कारण वहां भारतीय लोकतंत्र की परछाई तक दिखाई नहीं देती। इन सारी समस्‍याओं पर किसी वादी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में कोई वाद प्रस्‍तुत किया भी जाता है तो उस पर रात को क्‍या दिन में भी सुनियोजित और गंभीर सुनवाई नहीं होती। जिन समस्‍याओं से देश, लोकतंत्र और संविधान वास्‍तव में विघ्‍न-बाधाओं से घिरे हुए हैं, उर पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय उतना सक्रिय क्‍यों नहीं होता, जितना कि वह कांग्रेस का राजनीतिक हित साधने के लिए होता है। इन प्रश्‍नों की बेचैनी एक दिन उस अधिसंख्‍य जनता को भी लोकतंत्र के विरुद्ध जाने के लिए उकसा देगी, जो अनेक समस्‍याओं से घिरे रहकर भी अभी तक तन-मन-धन से लोकतंत्र को मानती है।