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Friday, November 17, 2017

विमुद्रीकरण देशहित में

जार और पांच सौ मूल्‍य के रुपयों की बंदी का आज पूरा एक वर्ष व्‍यतीत हो चुका है। गत वर्ष 8 नवंबर रात 8 बजे जब प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने बड़े मूल्‍य की मुद्रा को आधिकारिक रूप में अमान्‍य किए जाने की भारत सरकार की ओर से घोषणा करी, तो जैसे भारत की सामाजिक और आर्थिक जीवन-व्‍यवस्‍था कुछ क्षण के लिए थम गई। लोगों को समझ नहीं आया कि सरकार ने एकाएक यह क्‍या कर डाला।
विमुद्रीकरण की घोषणा किए जाने के दिन से लेकर अगले एक माह तक भारतीय जन-जीवन अपने सामान्‍य जीवन-व्‍यवहार से विपरीत अत्‍यंत असहज हो गया। राजनीतिक विरोधियों ने राष्‍ट्र हित में सरकार के निर्णय की दूरदर्शिता का विचार किए बिना, विमुद्रीकरण से जनता को हो रही तात्‍कालिक समस्‍याओं की ओट लेकर हो-हल्‍ला मचाना शुरू कर दिया। आरंभ में तो निष्‍पक्ष अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, विचारकों सहित मोदी समर्थकों ने भी विमुद्रीकरण को देश पर आर्थिक आपातकाल माना और इसको लेकर हर तरीके से मोदी सरकार की आलोचना करी।
विकेश कुमार बडोला 
मोदी के राजनीतिक विरोधियों के साथ-साथ सामान्‍य लोगों द्वारा विमुद्रीकरण के कारण उत्‍पन्‍न होनेवाली जिन सामाजिक तथा आर्थिक विपत्तियों की आशंकाएं प्रकट की गईं, विमुद्रीकरण का एक वर्ष व्‍यतीत हो जाने पर वैसा कुछ भी नहीं हुआ। विमुद्रीकरण की प्रक्रिया में लगे बैंक कर्मचारी तथा सामान्‍य लोग समय गुजरने के साथ जैसे-जैसे सहज होते गए, वैसे-वैसे उन्‍हें विमुद्रीकरण के दीर्घकालीन राष्‍ट्रीय उद्देश्‍य व लाभ समझ आने लगे।
          मोदी सरकार को अधिकांश भारतीय जनता ने इसलिए चुना था कि वह कांग्रेसी भ्रष्‍टाचार, अवैध मुद्रा प्रसार तथा करोबार पर स्‍थायी नियंत्रण करे और देश को एक सत्‍यनिष्‍ठ कार्य-व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध कराए। लेकिन क्‍या मोदी यह कार्य सामान्‍य ढंग से कर सकते थे? जो कांग्रेस 6 दशकों से सत्‍तारूढ़ रही हो, क्‍या उसके माध्‍यम से देशीय व्‍यवस्‍था के पोर-पोर में समाए भ्रष्‍टाचार को मोदी सरकार अपने सहज राजनीतिक वक्‍तव्‍यों, विरोध तथा सामान्‍य कामकाज के आधार पर ही समाप्‍त कर सकती थी? नहीं, इतना गहन भ्रष्‍टाचार परंपरागत राजनीतिक सोच, नीतियों और कार्यों से तो बिलकुल समाप्‍त नहीं होता। इसीलिए विमुद्रीकरण जैसा राष्‍ट्रीय निर्णय लिया गया।
पूर्व राजनीतिक कारस्‍तानियों के कारण व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार की बीमारी से छुटकारा पाने के लिए बड़ी व अनोखी नीतियों की आवश्‍यकता थी। विमुद्रीकरण इनमें से ही एक है। जनता को विचार करना चाहिए कि देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार मात्र मुद्रा आधारित नहीं था। भ्रष्‍टाचरण का यह रोग बहुत पहले से आतंकवाद, धर्मांतरण, लव जेहाद, हिन्‍दू विरोध और सर्वोपरि राष्‍ट्र विरोधी प्रवृत्ति का हो चला था।
आश्‍चर्य यह कि पिछली सरकारों में भ्रष्‍टाचार के ऐसे विरूपों को आधिकारिक मान्‍यताएं देने की कोशिशें होने लगी थीं। इसलिए वर्तमान में बहुसंख्‍यक जनापेक्षाओं के अनुसार आर्थिक मूल की इस विकृति पर कठोर नियंत्रण हेतु विमुद्रीकरण की अत्‍यंत आवश्‍यकता आन पड़ी थी।
निस्‍संदेह य‍ह निर्णय किसी भी सरकार को प्रथम दृष्‍टया जनता की नजर में अलोकप्रिय बना सकता था। विमुद्रीकरण को लेकर विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा फैलाए गए भ्रम के कारण शुरू में ऐसा हुआ भी। लेकिन मोदी सरकार की सत्‍यनिष्‍ठा के कारण अधिकांश लोग विमुद्रीकरण किए जाने के कुछ दिन बाद से ही सकारात्‍मक तथा संवेदनशील बनने लगे और सरकार के निर्णय के साथ खड़े होने का संकल्‍प दोहराने लगे। लोगों ने आत्‍मचिंतन से विमुद्रीकरण के सरकारी निर्णय को उचित माना। उन्‍हें भलीभांति समझ आ गया कि सच्‍चा जननेता वही है, जो अपने लोगों की दीर्घकालीन भलाई तथा सुरक्षा के लिए अलोकप्रिय निर्णय लेने से भी न हिचके।
          विरोधी राजनीतिक दलों तथा उनके मीडिया संस्‍थानों द्वारा विमुद्रीकरण का अर्थव्‍यवस्‍था के अनुरूप निष्‍पक्ष तरीके से विश्‍लेषण ही नहीं किया गया। कांग्रेस सरकार के प्रभाव और दबाव में काम कर चुके अर्थशास्त्रियों ने भी अर्थशास्‍त्र की समदृष्टि से विमुद्रीकरण का आकलन, आलोचना या प्रशंसा नहीं की।
वर्तमान केन्‍द्र सरकार के विरोध में राजनीति करना कांग्रेस तथा अन्‍य राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक प्रतिस्‍पर्द्धा के हिसाब से भले ही अपरिहार्य हो, लेकिन देशहित में लिए गए विमुद्रीकरण के निर्णय को मात्र राजनीतिक विरोध का आधार बनाना कदाचित उचित नहीं। विपक्ष में बैठे जनप्रतिनिधि भी जनता ही चुनकर भेजती है। ऐसे जनप्रतिनिधियों का चुनाव करके क्‍या जनता का यह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहता कि वे उन तक किसी भी तरह यह संदेश पहुंचाए कि सत्‍तारूढ़ सरकार के जनहितैषी निर्णयों का हर स्‍तर पर स्‍वागत किया जाना चाहिए, क्‍योंकि ऐसे निर्णय उनके जीवन के लिए भी सार्थक होते हैं।  
          अर्थव्‍यवस्‍था बहुत जटिल विषय है। किसी राष्‍ट्र में भ्रष्‍ट तंत्र और उसके संपूर्ण कार्यबल के कारण, स्‍थापित अर्थव्‍यवस्‍था के समानांतर जो अवैध और असंस्‍थागत आर्थिक गतिविधियां चलती हैं, उनके बने रहने के दौरान तो स्‍थापित और वैध अर्थव्‍यवस्‍था का परिचालन भी दुष्‍कर हो जाता है। इस परिस्थिति में वैध अर्थव्‍यवस्‍था भी एक नजर में अवैध ही प्रतीत होती है। इस देश में यह घालमेल पिछले 50 वर्षों से बहुत अधिक बना हुआ है। इतनी बड़ी आर्थिक अराजकता, विषमता को जड़ से मिटाने के लिए मात्र वार्षिक कराधान और बजटीय व्‍यवस्‍था कभी कारगर नहीं हो सकती थी।
यही कारण रहा, जो मोदी सरकार को विमुद्रीकरण जैसा ऐतिहासिक निर्णय लेना पड़ा। सरकार ने इस अलोकप्रिय निर्णय की चुनौती को न केवल स्‍वीकार किया, वरन् इस पर दिन-प्रतिदिन उमड़ते जनता के रोष को सटीक अर्थपूर्ण तथ्‍यों व आर्थिक विश्‍लेषण के द्वारा धीरे-धीरे कम भी किया।
विमुद्रीकरण की घटना देश को पवित्र, पारदर्शी और जनकल्‍याणोन्‍मुखी शासन व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध कराने की दिशा में महान घटना थी। इस घटना ने न केवल भारत को, अपितु न्‍यूनाधिक मात्रा में अनेक राष्‍ट्रों को प्रभावित किया। विभिन्‍न वैश्विक वित्‍तीय संस्‍थाओं, शक्तिशाली राष्‍ट्रों के योगदान से संचालित विश्‍व बैंक, अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष और देशों की अर्थव्‍यवस्‍था की रेटिंग जारी करनेवाले प्रमुख वैश्विक अभिकरणों ने भारत सरकार के विमुद्रीकरण के निर्णय को निष्‍पक्षता से सराहा है।
अभी हाल ही में सुगमतापूर्वक व्‍यवसाय संचालित करने के संदर्भ में विश्‍व बैंक की रेटिंग में भारत ने ऊंची श्रेणी प्राप्‍त की है। जबकि मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से होनेवाली कारोबारी सुगमताओं व लाभों की गणना अभी विश्‍व बैंक ने नहीं की। कारोबारी सुगमता के हिसाब से जीएसटी भी भारत को विश्‍व स्‍तर पर अत्‍‍यधिक विश्‍वसनीय, पारदर्शी तथा सकारात्‍मक बनाएगा। इस स्थिति में यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि अगले वर्ष विश्‍व बैंक की रेटिंग में भारत और उच्‍च श्रेणी प्राप्‍त कर ले। हालांकि जीएसटी के सहज व सरल क्रियान्‍वयन में अभी समस्‍याएं आड़े आ रही हैं। ऐसा जीएसटी सॉफ्टवेयर के जीएसटी प्रक्रिया के अनुरूप बने व संचालित न होने तथा जीएसटी के बारे में सरकारी व निजी स्‍तर पर संपूर्ण ज्ञान के अभाव के कारण हो रहा है।  
          इस समय मोदी सरकार के आर्थिक, व्‍यापारिक शासन-प्रशासन के प्रारंभिक सकारात्‍मक कार्यों का विश्‍लेषण भारत स्थित कोई रेटिंग एजेंसी या मीडिया संस्‍थान नहीं कर रहा। सरकार के कार्यों का यशगान वैश्विक संस्‍थाएं कर रही हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो मोदी सरकार द्वारा लिया गया विमुद्रीकरण का निर्णय वाकई अद्वितीय है।
          लेकिन कांग्रेस के नेतृत्‍व में संपूर्ण विपक्ष ने आठ नवंबर को विमुद्रीकरण के विरोध में जो काला दिवस मनाने का निर्णय लिय, वह यही दर्शाता है कि कांग्रेसी न केवल राजनीतिक रूप से अपितु आर्थिक रूप से भी देश संभालने के लिए दक्ष नहीं हैं। उन्‍हें काला दिवस मनाने के बजाए इस बात पर आत्‍ममंथन करना चाहिए था (करना चाहिए) कि वे देश की अधिकांश जनता की नजर में घिनौने स्‍तर तक हास्‍यास्‍पद बन चुके हैं।